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रफ्तार में कुछ तेजी

भारत की सबसे तेज ट्रेन का ट्रायल रन शुरू हो चुका है। यह ट्रेन दिल्ली से आगरा के बीच चलेगी और इसकी अधिकतम रफ्तार 160 किलोमीटर प्रति घंटा होगी। यह 90 मिनट में दिल्ली और आगरा के बीच की दूरी तय करेगी। ट्रेन इतनी रफ्तार से चल पाए, इसके लिए भी रेलवे को कई इंतजाम करने पड़ रहे हैं, ट्रैक को कई जगह सुधारा जा रहा है, कई जगह ट्रैक के दोनों ओर फेंसिंग लगाई जा रही है, ताकि कोई रुकावट न हो। अब तक भारत की सबसे तेज ट्रेन भोपाल शताब्दी है, जो 150 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चल सकती है, लेकिन दिल्ली-भोपाल के बीच ट्रैक हर जगह ऐसा नहीं है कि इतनी रफ्तार से ट्रेन चल सके और वह कई जगह रुकती भी है, इसलिए इसकी औसत रफ्तार 100 किलोमीटर प्रति घंटा से भी कम होती है। 160 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार से चलने वाली इस ट्रेन को सेमी-हाई स्पीड ट्रेन कहा जा रहा है। दुनिया के कई देशों में हाई स्पीड ट्रेनें 200 से लेकर 400 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार से चलती हैं।

यह ट्रेन सिर्फ 200 किलोमीटर का सफर तय करेगी। अगर स्टेशन तक पहुंचने और स्टेशन से घर पहुंचने का समय भी जोड़ लिया जाए, तो यमुना एक्सप्रेस हाईवे से दिल्ली-आगरा की दूरी इतने ही या इससे भी कम समय में कार से तय की जा सकती है। लेकिन इसका एक प्रतीकात्मक महत्व है। इससे यह पता चलता है कि भारतीय रेल महकमा लंबे अरसे के बाद रफ्तार के नजरिये से सोच रहा है। अब तक की सबसे तेज ट्रेन भोपाल शताब्दी को चले हुए 25 साल से ज्यादा हो गए हैं और उसी दौर में तेज शताब्दी ट्रेनें चलाने की शुरुआत हुई थी। भोपाल शताब्दी की रफ्तार इस बीच बढ़ी नहीं, बल्कि घटी ही है। भारत की ज्यादातर लंबी दूरी की ट्रेनों में सफर करना बहुत मुश्किल अनुभव है, क्योंकि हमारे यहां ऐसी ट्रेनें भी हैं, जो तीन या चार दिन लगा देती हैं।

राजनीतिक वजहों से इनके स्टॉप बढ़ते जाते हैं और होता यह है कि 1,500 किलोमीटर का सफर तय करने वाली ट्रेन हर 50-100 किलोमीटर पर रुकती हुई चलती है। अगर रफ्तार बढ़ाने की सचमुच जरूरत है, तो देश की लंबी दूरी की तमाम ट्रेनों के लिए है, जो औसतन 40-50 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार से अपना सफर तय करती हैं और अपनी मंजिल तक पहुंचने में तीन दिन तक लगा देती हैं। लेकिन इस नई ट्रेन से यह उम्मीद बनती है कि रेलवे में अब फिर से अपनी ट्रेनों को तेज करने पर विचार शुरू हो गया है। पिछले काफी समय से इसकी बातें होती थीं, लेकिन यह मसला उसकी प्राथमिकता में नहीं था। हो सकता है कि भविष्य में लंबी दूरी के लिए भी तेज ट्रेनें चलनी शुरू हो जाएं और मौजूदा लंबी दूरी की ट्रेनों की भी किस्मत संवर जाए।

जिस दौर में शताब्दी ट्रेनें शुरू हुई थीं, वह आखरी दौर था, जब भारतीय रेलवे तरक्की की राह पर चल रही थी। उसी दौर में रेलवे में कंप्यूटर से टिकट और आरक्षण की व्यवस्था हुई और कई सारी नई सेवाएं भी जुड़ीं। उसके बाद के दौर में भारतीय रेल पिछड़ती ही चली गई। 25 साल पहले भारतीय रेल चीन के मुकाबले आगे थी। अब चीन, भारत से इस क्षेत्र में कई गुना ज्यादा तरक्की कर चुका है। अब भारतीय रेलवे के सुधरने की उम्मीद इसलिए भी है कि स्थिति बहुत ज्यादा खराब, बल्कि खतरनाक स्तर पर आ चुकी है। अगर अब भी रेलवे को सुधारने की कोशिश नहीं हुई, तो भारतीय रेलवे की स्थिति पाकिस्तान रेलवे की तरह हो जाएगी। पिछले कुछ वक्त से रेलवे की दुर्दशा पर चर्चा चल रही है और लगता है कि अब शायद इसकी बेहतरी के लिए काम शुरू हो जाएगा। अगर यह नई ट्रेन इसका संकेत है, तो यह अच्छी बात है।

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