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एक बारात ऐसी जिसमें कठपुतली और खिलौने भी बाराती

एक बारात ऐसी जिसमें कठपुतली और खिलौने भी बाराती

गयाधाम का अंदर गया। इसी इलाके में विष्णुपद मंदिर। मुख्य रूप से पंडों की बस्ती। अब भी करीब 100 घर गयावाल रहते हैं। रहन-सहन सामान्य लोगों से थोडम अलग। काफी समृद्ध इनका इतिहास। परंपरा की कुछ डोरों से अब भी बंधे। कुछ में बदलाव और कुछ में संशोधन।

गयावाल के शादी की बात आज भी निराली। खासकर इनकी बारात। आम लोगों की बारात में दूल्हा और बारात। लेकिन इनकी बारात में दूल्हा, बारात के अलावा कठपुतली, मिट्टी और कागज के खिलौने, मूर्तियां, मिठाई सहित अन्य सामग्री। लग्जरी कार की जगह दूल्हा घोड़े पर। काफी शान-शौकात के साथ जब बारात निकलती है तो शहर के लोग देखने के लिए चौक-चौराहों पर इकट्ठे हो जाते हैं।

पांच बारात पहले निकलती थी 
करीब पचास साल पहले पंडा समाज में शादी संपन्न कराने के लिए पांच बार बारात निकलती थी। तिलक की बारात, बैंड-बाजे वालों की बारात, लड़की के गहने की बारात, शादी की बारात और अंत में शादी के बाद भोज के लिए बारात। पर बदलते जमाने के बाद बारात की सूरत की बदली। अब दो या तीन बारात निकलती है।

गया की गलियों में जाती है बारात
गया के पंडों की शादियां मुख्य रूप से अंदर गया में बसे समाज के लोगों के बीच ही होती है। पचास साल पहले भी शादी का यही प्रचलन था और आज भी वही परंपरा मजबूती के साथ कायम। लड़का या लड़की की शादी हो, गया में ही तय होती है। गयावाल अपनी संस्कृति के अनुसार ही शादी रचाते हैं। गया में ही शादी करने के तर्क पर कहते हैं कि जिस तरह गोकुल की बेटियों की शादी मथुरा में होती है उसी तरह हम लोग गया में ही शादी करते हैं।

क्या कहते हैं गयावाल
श्री विष्णुपद प्रबंधकारिणी समिति के सदस्य और समाज के जाने-माने गयावाल महेशलाल गुपुत कहते हैं कि पंडा समाज में शादियां तो वाराणसी पंचाग के मुताबिक ही होती हैं लेकिन रस्म अदायगी का अपना अंदाज है। चालीस-पचास साल पहले छोटी उम्र में विवाह हो जाते थे। एक शादी के लिए पांच बारात निकालने की रस्म थी। लेकिन युग बदला और इसमें बदलाव आया। अब मुख्य रूप से दो ही बारात निकलती हैं। चाहे लड़के हों या लड़कियां शादी तो अंदर गया में बसे समाज के लोगों के बीच ही होती है। गया से बाहर शादी करने का प्रचलन ही नहीं है। लेकिन शादी के बाद अब भी शास्त्रीय संगीत का आयोजन होता है।

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