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चार इंजीनियर आईपीएस बना रहे दिल्ली की राहें आसान

चार इंजीनियर आईपीएस बना रहे दिल्ली की राहें आसान

ट्रैफिक पुलिस में तैनात चार अफसर अपने इंजीनियरिंग के हुनर से दिल्ली की राह आसान बना रहे हैं। इनका मूल काम भले ही ट्रैफिक संचालन है लेकिन इन्होंने सड़कों पर कई बड़े बदलावों का खाका खींचा है। जिस प्रोजेक्ट की रिपोर्ट तैयार करने में सिविक एजेंसियों को करोड़ों रुपये खर्च करने पड़ते हैं, ट्रैफिक पुलिस के ये इंजीनियर महज दो-सप्ताह में ही उसका ले-आउट प्लान संबंधित एजेंसी को सौंप देते हैं।

डीसीपी से लेकर स्पेशल सीपी तक के ये अधिकारी इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर भारतीय पुलिस सेवा में आए थे। पिछले दो वर्षों में इन अफसरों ने करीब एक दर्जन ऐसे प्रोजेक्ट पर काम किया है, जिनसे दिल्ली की सड़कों पर कई अहम बदलाव नजर आएंगे। चालकों को जाम से छुटकारा मिलेगा, उन्हें लालबत्ती पर वाहनों की लंबी कतार में नहीं खड़ा होना पड़ेगा और जानलेवा हादसों का पर्याय बनी सड़कों की इंजीनियरिंग में भी सुरक्षात्मक बदलाव देखने को मिलेंगे। खास यह है कि पीडब्लूडी, मेट्रो और यूटीपैक ने भी ट्रैफिक पुलिस द्वारा तैयार अधिकांश प्रोजेक्ट को अपनी सैद्धांतिक मंजूरी दी है। स्पेशल सीपी (ट्रैफिक) मुक्तेश चंद कहते हैं कि हमारे अफसर न केवल वर्तमान, बल्कि भविष्य की दिक्कतों के मद्देनजर प्रोजेक्ट रिपोर्ट तैयार करते हैं।

इन योजनाओं में दिखा पुलिस इंजीनियरों का हुनर 
- कश्मीरी गेट पर जाम से राहत और हादसे रोकने के लिए योजना बनाई
- पश्चिम दिल्ली से सेंट्रल दिल्ली की राह आसान करने के लिए प्रोजेक्ट तैयार किया
- धौलाकुआं, एनएच-8, टी-1, टी-3, सहित कई सडम्कों से वाहनों का दबाव कम किया
- धौलाकुआं पर जाम की दिक्कत दूर करने के लिए विस्तृत रिपोर्ट तैयार की
- अरबिंदो मार्ग को जाम मुक्त, सिग्नल फ्री बनाना , इंडिया गेट पर नई पार्किंग व्यवस्था
- अक्षरधाम पुल पर पीकऑवर में लगने वाले जाम से मुक्ति दिलाने की योजना बनाई

रुपये और समय की बचत
रोड इंजीनियरिंग में बदलाव, फ्लाईओवर का निर्माण आदि कार्यों के लिए तकनीकी सलाहकार की मदद ली जाती है। प्राइवेट कंपनियां डिजाइन तैयार के लिए एक करोड़ से चार करोड़ तक फीस लेती हैं। इसमें भी टेंडर प्रक्रिया होती है। इसमें भी कई तरह की बाधाएं आती हैं। पूरी प्रक्रिया में डेढ़-दो वर्ष लगते हैं। ट्रैफिक पुलिस के इंजीनियर इस काम को महज दो-तीन सप्ताह में कर देते हैं। 

वास्तविक स्थिति पर रिपोर्ट
ट्रैफिक पुलिस के इंजीनियर जमीनी स्तर पर जुटाए गए तथ्यों के आधार पर प्रोजेक्ट रिपोर्ट तैयार करते हैं। पिछले दिनों मेट्रो ने मंडी हाउस चौक का खाका खींचा था, जिसमें दो तरफ रोड की चौड़ाई 12-12 मीटर रखी गई, बाकी के हिस्से को 16 मीटर में समेटा गया। ट्रैफिक पुलिस ने पीकऑवर में वाहनों की स्थिति के अनुसार जब इस प्रोजेक्ट को गलत करार दिया तो मेट्रो ने भी उसे मानने में देर नहीं लगाई। बाद में चौक के चारों तरफ 16 मीटर चौडम रोड बनाया गया।

दिल्ली पुलिस के लिए भी मददगार बने ये इंजीनियर
दिल्ली पुलिस के अत्याधुनिक प्रोजेक्ट आईटीएस, रेड स्पीड कैमरा, नाइट इंटरसेप्टर, ई-चालान, सीसीटीवी प्रोजेक्ट और ट्रैफिक सिग्नल से जुड़ी योजनाओं में भी इंजीनियर आईपीएस अनिल शुक्ला और प्रेमनाथ ने अपना अहम योगदान किया है। इससे दिल्ली पुलिस का पैसा और समय, दोनों की बचत हुई हैं।

35 करोड़ से ज्यादा खर्च हुए कन्सलटेंसी पर
दिल्ली में तीन-चार वर्षों के दौरान करीब दर्जनभर प्रोजेक्ट ऐसे हैं, जिनका डिजाइन आदि तैयार करने में 35 करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च हुए हैं। कॉमनवेल्थ खेलों के दौरान विभिन्न सड़कों की कायापलट, फ्लाईओवर, सब-वे व एफओबी बनाने के लिए 23 करोड़ रुपये कन्सलटेंट को दिए गए थे। सामान्यत: किसी प्रोजेक्ट की कन्सलटेंसी फीस उसकी कुल लागत का सात फीसदी हिस्सा होता है। यदि प्रोजेक्ट की जगह भीड़-भाड़ वाली है, वहां पर अंडरपास या एफओबी भी बनना है तो यह फीस अधिकतम दस प्रतिशत तक हो सकती है। रिंग रोड बाईपास, बाहरी रिंग रोड को सिग्नल फ्री बनाने, जेएलएन नेहरू स्टेडियम के आसपास का नक्शा बदलना, बारापुला, गीता कालोनी फ्लाईओवर और पुराना किला के आसपास के इलाके में सड़कों के प्रोजेक्ट पर 25 करोड़ से ज्यादा अकेले कन्सलटेंसी पर खर्च हुए थे।

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