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टीएसी गठन का प्रस्ताव फिर भेजेगी सरकार

रांची। हिन्दुस्तान ब्यूरो। जनजातीय परामर्शदातृ पर्षद (टीएसी) के गठन का प्रस्ताव सरकार फिर से भेजेगी। सीएमओ से मिली जानकारी के अनुसार इसी सप्ताह राजभवन को प्रस्ताव भेजा जाएगा। टीएसी के गठन के संबंध में परंपरा रही है कि जो भी नई सरकार बनती है, वह टीएसी गठन का प्रस्ताव राजभवन को भेजती है। राज्यपाल इस पर सहमति देते हैं। मुख्यमंत्री होते हैं पदेन अध्यक्षटीएसी का मुख्यमंत्री पदेन अध्यक्ष होते हैं। लिहाजा मुंडा सरकार गिरने के बाद नई सरकार को टीएसी का फिर से गठन करना था।

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने जनवरी में पहली बार टीएसी गठन का प्रस्ताव राज्यपाल के पास भेजा था। तब से यह प्रक्रिया खींच रही है। कहां फंसा है पेंचराज्य गठन के बाद पहले मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी के समय से अब तक मुख्यमंत्री द्वारा गठन का प्रस्ताव भेजा जाता रहा है। सरकार अपनी पसंद के लोगों को सदस्य के रूप में नामित कर फाइल अनुशंसा के लिए राजभवन को भेजती है। जिस पर राजभवन से सहमति मिलती है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने भी इसी परंपरा के तहत नाम भेजा था।

जनवरी से टीएसी के गठन की प्रक्रिया चल रही है, लेकिन राजभवन ने दो बार फाइल वापस भेज दी है। चर्चा है कि राजभवन अपने अनुसार गठन करना चाहता है। गठन नहीं होने का नुकसानराज्य में भूमि अधिग्रहण समेत जनजातियों के उत्थान व विकास के लिए कई निर्णय लिए जाने हैं। इसमें टीएसी की भूमिका अहम होती है। टीएसी केंद्र और राज्य सरकार द्वारा आदविासियों के जुड़ी योजनाओं की मॉनिटिरिंग करता है। अब तक टीएसी की नहीं रही है प्रभावी भूमिकाराज्य में अब तक जनजातीय परामर्शदातृ पर्षद की प्रभावी भूमिका नहीं रही।

सिर्फ बैठक कर इसकी औपचारिकता ही पूरी की गई है। दूसरा पक्ष यह भी है कि टीएसी जिन योजनाओं को स्वीकृत करती है, उसे राज्य सरकार को ही पूरा करना पड़ता है। ‘टीएसी का इतने दिनों तक गठन नहीं होना दुर्भाग्यपूर्ण है। एक तो राज्य में टीएसी प्रभावी नहीं है, दूसरा लंबे समय तक गठित नहीं कर राज्य हित को और भी अनदेखा किया जा रहा है। ’-बंधु तिर्की, विधायक, तृणमूल कांग्रेस।

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