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कहां गए ब्राजील के अश्वेत

एक पत्रकार के तौर पर मैं इस समय ब्राजील में चल रहे विश्व कप फुटबॉल की रिपोर्टिंग कर रहा हूं। कई बार जब मैं दर्शकों से खचाखच भरे स्टेडियम में पहुंचता हूं, तो एक सवाल मन में उठता है- अश्वेत लोग कहां हैं? ब्राजील के जिन शहरों में विश्व कप का यह आयोजन चल रहा है, उनमें से पांच में मैं अब तक जा चुका हूं, और हर जगह मैं इसी सवाल का जवाब ढूंढ़ता हूं। यहां तक कि मैं लोगों को देखने में इतना खो जाता हूं कि कई बार तो मैं गोल होते हुए भी नहीं देख सका। इस सवाल का जवाब मिलना शायद इतना आसान भी नहीं है।

सल्वाडोर ब्राजील का ऐसा शहर है, जिसका सबसे ज्यादा अफ्रीकीकरण हुआ है। यहां जब जर्मनी और पुर्तगाल का मैच चल रहा था,तो अश्वेत लोगों की तादाद इतनी कम थी कि कई बार मुझे लगा कि जैसे मैं ब्राजील के सल्वाडोर में नहीं, अमेरिका के मिड-वेस्टर्न शहर कन्सस में हूं। ऐसा ही बाकी जगहों पर लगा। साओ पाउलो में भी, फोर्टालेजा में भी, रिओ डी जेनेरो में भी और रेसिफ में भी। ब्राजील के सारे अश्वेत लोग कहां चले गए? यह ऐसा देश है, जहां अफ्रीका के बाद अफ्रीकी मूल के लोगों की सबसे बड़ी आबादी रहती है। दुनिया भर में ब्राजील को एक सतरंगी देश के रूप में पेश किया जाता है- सभी जातीयताओं के मिले-जुले लोकतंत्र के एक अच्छे उदाहरण के रूप में। बहुत हद तक यह सही भी है। ब्राजील एक बहुत बड़े आकार और आबादी वाला ऐसा देश है, जहां तरह-तरह की जातीयताओं और पृष्ठभूमि वाले लोग रहते  हैं, लेकिन उनके बीच कोई जातीय या धार्मिक टकराव नहीं है और वे सब के सब एक ही भाषा बोलते हैं। हालांकि सामाजिक तौर पर देखें, तो यह कहानी थोड़ी अलग है। ब्राजील की सरकार यह उम्मीद रखती है कि वह विश्व कप फुटबॉल जैसे आयोजन का इस्तेमाल इस देश की सांस्कृतिक विभिन्नता और इसके लगातार तरक्की करते लोकतंत्र के गौरव को पूरी दुनिया को दिखाने के लिए करेगी। लेकिन हो कुछ और ही रहा है। इस आयोजन से यहां की 20 करोड़ आबादी के पूर्वाग्रह और उनकी गैर-बराबरी ही प्रदर्शित हो रही है।

एक ऐसा देश, जहां की 60 फीसदी आबादी या तो अश्वेत लोगों की है या फिर मिश्रित नस्ल की, वहां इतने बड़े व ऐतिहासिक आयोजन में ऐसे हालात क्यों हैं? आबादी का 60 फीसदी हिस्सा इन ऐतिहासिक आयोजनों से इस कदर नदारद क्यों है? जितना दुखद यह सवाल है, जवाब उससे कहीं ज्यादा दुखद है। ब्राजील के ज्यादातर अश्वेत लोग गरीब हैं। यहां मामला दक्षिण अफ्रीका या अमेरिका की तरह नहीं है। ब्राजील में अश्वेत लोगों का कोई मध्य वर्ग नहीं है। और इससे भी बड़ी बात यह कि यहां अश्वेत लोग एक राजनीतिक वर्ग के रूप में संगठित नहीं हैं। विश्व कप के मैच का टिकट कम से कम 90 डॉलर (तकरीबन 550 रुपये) का है, जबकि सबसे महंगा एक हजार डॉलर का है। इस हिसाब से देखें, तो एक देश जहां एक व्यक्ति की महीने भर की न्यूनतम मजदूरी 350 डॉलर हो, वहां के ज्यादातर लोग माराकॉना स्टेडियम में घुसने की हैसियत नहीं ही रखते होंगे।

फोर्टालेजा में जिस समय जर्मनी और घाना के बीच मैच चल रहा था, उस समय दर्शकों के बीच कई अश्वेत लोग दिख रहे थे। इनमें ज्यादातर घाना के लोग थे, या फिर स्टेडियम के आस-पास रहने वाले वे अश्वेत लोग थे, जो यहां मौजूद मध्यवर्गीय फुटबॉल प्रेमियों को कोल्ड ड्रिंक्स और स्नैक्स बेच रहे थे। लंबी लाइनों में लगकर यहां पहुंचे फुटबॉल प्रेमियों को इस सबकी चिंता नहीं थी। विश्व कप फुटबॉल का आयोजन करने वाले संगठन फीफा ने स्टेडियम से तीन किलोमीटर पहले सड़क पर बाधाएं खड़ी कर दी हैं, जिनकी वजह से दर्शकों को यहां तक पैदल चलकर आना पड़ता है। जो लोग इतना पैदल नहीं चल सकते या नहीं चलना चाहते, उनकी सेवा में गरीब अश्वेत नौजवान मौजूद थे, जो दर्शकों को अपनी बाइक पर बैठाकर ले जाते थे।

जातीय पृष्ठभूमि को लेकर ब्राजील के लोगों का एक खास तरह का रवैया रहा है। चार साल पहले जब ब्राजील की फुटबॉल टीम के सुपरस्टार खिलाड़ी नेमार से यह पूछा गया कि क्या वह कभी जातीय भेदभाव के शिकार बने हैं? उनका जवाब था, ‘कभी नहीं। न मैदान के अंदर और न मैदान के बाहर। क्योंकि मैं अश्वेत नहीं हूं।’ याद रहे कि नेमार मिश्रित नस्ल के हैं। ब्राजील की राष्ट्रीय टीम के ज्यादातर खिलाड़ी या तो अश्वेत हैं या मिश्रित नस्ल के हैं। यह बात अलग है कि नेमार समेत इनमें से ज्यादातर खिलाड़ियों ने अपने बालों को ब्लोंड यानी सुनहरा करवा रखा है। ब्राजील की खेल दुनिया के बाकी नायक भी जातीय भेदभाव की बात से हमेशा ही इनकार करते रहे हैं। रोनाल्डो तो अपनी अश्वेत पृष्ठभूमि से ही इनकार कर चुके हैं। देश के सबसे बड़े और महान खिलाड़ी माने जाने वाले पेले इन दिनों विज्ञापनों में इतने व्यस्त हैं कि उनके पास इस मसले पर कुछ महत्वपूर्ण कहने की फुरसत ही नहीं है।

ब्राजील ने 1888 में दास प्रथा को आधिकारिक तौर पर हमेशा के लिए खत्म कर दिया था। पश्चिमी गोलार्ध में ऐसा करने वाला वह आखिरी देश था। अब यहां से चलते हैं सन 2012 में, जब ब्राजील ने गरीब लोगों के लिए स्कूलों में आधी सीटें आरक्षित करने का कल्याणकारी कानून बनाया। इसी के बाद से ब्राजील के स्कूलों में अफ्रीकी मूल के बच्चों की संख्या बढ़ी। ब्राजील के अधिकारियों का कहना है कि यह नजरिये में आया एक महत्वपूर्ण मोड़ है, जो आबादी के बड़े हिस्से को नए अवसर देता है। लेकिन इस विश्व कप फुटबॉल में ब्राजील की अश्वेत आबादी को कोई अवसर नहीं मिल सका। इस मसले पर ब्राजील ने एक सेल्फ गोल कर लिया।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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