DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

कम बारिश से खिंची चिंता की लकीरें

इस साल बारिश कम होने की आशंका से आर्थिक-सामाजिक चिंता की लकीरें गहरी हो गई हैं। भारतीय मौसम विभाग (आईएमडी) ने कहा है कि इस साल बारिश 50 वर्षों के औसत की 93 फीसदी रहेगी। यह भी बताया गया कि अल-नीनो की वजह से कम बारिश होगी और पश्चिम भारत में सूखा पड़ सकता है। संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) ने भी अनुमान लगाया है कि इस साल भारत में कम बारिश होगी, जिससे खरीफ फसल पर बुरा असर पड़ेगा। यह अनुमान और परेशान करने वाला है कि देश के प्रमुख अनाज उत्पादक क्षेत्र पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश व राजस्थान के कुछ हिस्सों में बारिश सामान्य से 15 फीसदी तक कम हो सकती है। देश के ज्यादातर हिस्सों में बारिश में छह-सात फीसदी तक की कमी दिख सकती है। इसमें दक्षिण व मध्य भारत के वे क्षेत्र भी हैं, जो कृषि के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं। मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, राजस्थान व गुजरात की खेती भी मानसून पर निर्भर है।

कृषि विशेषज्ञ चिंता जताते हुए कहते हैं कि जून में मानसून की कमजोरी से कृषि व उद्योग क्षेत्र को जो नुकसान पहुंचा है, उसकी भरपायी जुलाई और अगस्त की अच्छी बारिश भी नहीं कर पाएगी। मानसून में देरी का असर खरीफ फसलों की बुआई पर पड़ने लगा है। धान, दलहन, तिलहन व मोटे अनाजों की बुआई में भारी कमी दिखी है। वैसे भी,  देश में कमजोर मानसून कई आर्थिक मुश्किलों का कारण माना जाता है। देश की 60 फीसदी खेती मानसून पर निर्भर है और जीडीपी में कृषि का योगदान करीब 13 फीसदी है। करोड़ों लोगों की रोजी-रोटी व रोजमर्रा की जिंदगी के साथ कला, संस्कृति व लोक-जीवन पर इसका सीधा प्रभाव है। इसलिए इसकी देरी से परेशानी स्वाभाविक है। कुछ ऐसे कारक हैं, जो कम वर्षा में भी राहत दे सकते हैं। जैसे, दक्षिण के ज्यादातर जलाशयों में पर्याप्त जल हैं। ये सिंचाई व जल विद्युत उत्पादन के लिए उपयोगी हैं। देश के पास 2.06 करोड़ टन चावल व 4.15 करोड़ टन गेहूं का बड़ा भंडार है, जो कीमतों को नियंत्रित करने में मददगार होगा। 

ऐसे में, यह संतोषजनक है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इससे उत्पन्न चुनौतियों से निपटने के लिए मंत्रियों व मौसम विभाग के आला अधिकारियों के साथ लंबी बैठक करके रणनीति तैयार की है। यह सही होगा कि फसल में अपर्याप्त नमी और उत्पादन में कमी से निपटने के उपायों पर तथा जल-संरक्षण पर ध्यान दिया जाए। जिन इलाकों में अपर्याप्त नमी से बुआई में देरी हो, वहां किसानों को ऐसे बीज दिए जाएं, जो जल्द तैयार होते हों और जो उपज भी अच्छी देते हों। गांवों में मनरेगा को जारी रखा जाए और सूखाग्रस्त इलाकों में कृषि-कर्जों पर ब्याज सहायता दी जाए। डीजल व बीज पर सब्सिडी का प्रावधान भी जरूरी है। इनमें से कई प्रावधान आगामी बजट में किए जा सकते हैं।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

 

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:कम बारिश से खिंची चिंता की लकीरें