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धांसू डायलॉग की राजनीतिक डिलेवरी का हश्र

तापस पॉल पुराने अभिनेता हैं, बंगाली फिल्मों के हीरो रह चुके हैं। जब उन्हें लगा कि कोई जोशीला संवाद बोलना चाहिए, तो उन्होंने शायद सोचा कि उनकी अपनी ही फिल्मों के किसी खलनायक का संवाद बोल दें। वैसा ही उन्होंने किया और मुसीबत में फंस गए। उन्हें पता नहीं  था कि राजनीति में फिल्मों से ज्यादा खतरनाक खलनायक होते हैं। मोगैंबो और गब्बर सिंह को तो शायद राजनीति में किसी खलनायक के दसवें चमचे का रोल ही मिल सके, लेकिन राजनीति में भाषा की एक मर्यादा होती है। वहां आपको किसी की छाती में छुरा भोंकना हो, तो भी उसे ‘माननीय महोदय’ कहना होगा, पीठ में भोंकने के लिए तो और ज्यादा शिष्ट भाषा बोलनी होगी।

तापस पॉल ने सोचा कि किसी भी दुश्मन को तहस-नहस करने के सबसे प्रभावी तरीकों में से एक महिलाओं के साथ बलात्कार करना है। बर्बर फौजें और उतने ही बर्बर दंगाई ऐसा करते आए हैं। वैसे जो भी बलात्कारी होते हैं, वे महिलाओं को अपना दुश्मन मानकर ही व्यवहार करते हैं। तापस पॉल की कल्पना में तृणमूल कार्यकर्ताओं के पिंडारियों जैसे जत्थे माकपा समर्थकों के गांवों पर हमला कर रहे होंगे और गांवों को ध्वस्त करने, सारे पुरुषों को मारने और महिलाओं के साथ बलात्कार करने के बाद वहां तृणमूल कांग्रेस का झंडा फहरा रहे होंगे। उनकी कल्पना में भारत अब भी सत्रहवीं-अठारहवीं शताब्दी में है। लोकतंत्र यहां आया ही नहीं है।

भारत के बहुत सारे लोगों की कल्पना में अब भी मध्य युग विराजता है। इनमें कई राजनेता भी हैं। लोकतंत्र उनके लिए एक बेमतलब का बोझ है। इसीलिए हमारा लोकतंत्र कई छोटे-छोटे सामंतों या तानाशाहों का जोड़ है। लेकिन इस लोकतंत्र का हमें आभारी होना चाहिए कि इसकी वजह से ये सामंतशाह या तानाशाह इतने बड़े नहीं हो पाते कि बाकायदा घोषित रूप से सामंतशाही की स्थापना कर सकें।

तापस पॉल को ससम्मान वापस वहां भेज देना चाहिए, जहां से वह आए हैं, यानी फिल्मों में, वरना किसी दिन इसी रास्ते यो यो हनी सिंह भी सांसद बन जाएंगे। क्या आप चाहते हैं कि आपके सांसद गाते हुए मिलें- ‘मैं हूं बलात्कारी?’

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