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बर्तन मांजता वह चे ग्वेरा

वह अन्ना आंदोलन का दौर था। दिल्ली पूरी तरह अन्नामय हो चुकी थी। मैं भी उन दिनों क्रांति मोड में था। एक दिन मैं आंदोलन स्थल पर पहुंचा, तो धूप बहुत तेज थी और मुझे भूख भी लगी थी। मैं टहलता हुआ आगे डोसे की एक दुकान तक पहुंचा। वहां 15 साल का एक बच्चा, जिसने चे ग्वेरा की तस्वीर छपी टी-शर्ट पहन रखी थी, अपने मालिक की मार खा रहा था। पता चला कि मेज साफ करते समय उसका पोंछा झक्क सफेद कपड़े वाले कुछ क्रांतिकारियों से जा टकराया था। फिर भी, मैंने उसके मालिक से पूछा, ‘क्यों मार रहे हो इसे?... पता है न बाल मजदूरी कराना अपराध है, नप जाओगे।’ मुझे थोड़ा गुस्सा आया। ‘नहीं जी, लेबर कहां, यह तो भतीजा है मेरा’, दुकान वाला सकपकाया। इस बीच वहां डोसा खाने आए युवा क्रांतिकारियों की सहन शक्ति समाप्त हो चली थी। वे दुकान वाले पर चिल्ला रहे थे। दुकानदार बच्चे का हाथ पकड़ दुकान के अंदर लेकर चला गया। अब मैं युवाओं के उस समूह की ओर मुखातिब हुआ। शायद मेरे हाव-भाव देख उन्हें लगा कि मैं ज्ञान बांटने की कोशिश करूंगा। उनके लिए मैं वहां अनुपस्थित था। मुझे बार-बार उस बच्चे का निरीह चेहरा याद आ रहा था। मन किया कि पुलिस को फोन करके बता दूं, पर मैं ऐसा नहीं कर सका। मुझे ऑफिस जल्दी पहुंचना था। मैं लगातार यही सोचता रहा कि यह एक फोन कॉल मेरी व्यवस्थित जिंदगी में कितनी अव्यवस्था पैदा कर सकती थी? मैंने चे ग्वेरा को उस दुकान के पीछे सिसकते हुए बर्तन मांजते देखा था।
तहलका वेब पोर्टल में संदीप कुमार

 

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  • Web Title:बर्तन मांजता वह चे ग्वेरा