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जासूसी का जंजाल

एक अमेरिकी अखबार में छपी खबर के मुताबिक अमेरिका की नेशनल सिक्युरिटी एजेंसी (एनएसए) ने कई विदेशी राजनीतिक पार्टियों की भी जासूसी की थी, इनमें भारतीय जनता पार्टी भी शामिल है। इस सूची में पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी और मिस्र के मुस्लिम ब्रदरहुड जैसे संगठन भी शामिल हैं। यह खबर एनएसए के पूर्व जासूस एडवर्ड स्नोडेन द्वारा लीक  दस्तावेजों पर आधारित है। स्नोडेन ने कुछ वक्त पहले यह रहस्योद्घाटन करके खलबली मचा दी थी कि एनएसए ने दुनिया के कई देशों में जासूसी का जाल सर्वोच्च स्तर पर फैला रखा था। स्नोडेन के उद्घाटनों को देखकर यह लगता है कि शायद ही किसी देश की सरकार और महत्वपूर्ण संगठन इस जासूसी से बचे हों। स्नोडेन के खुलासे के मुताबिक, दुनिया भर के 193 देश या संगठन जासूसी के घेरे में थे। इनमें वल्र्ड बैंक व अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसे संगठन भी शामिल हैं।

अगर भाजपा की जासूसी हुई, तो वह तब हुई होगी, जब वह विपक्ष में थी। ‘अगर’ इसलिए, क्योंकि यह सूची उन संगठनों या देशों की है, जिनकी जासूसी के लिए इजाजत मांगी गई थी और वह इजाजत अमेरिकी सरकार ने दी थी। इन सब पर जासूसी की गई या नहीं, यह इन दस्तावेजों से साफ नहीं है। लेकिन अगर जासूसी की इजाजत भी दी गई, तो यह गंभीर मसला है और इसका विरोध दर्ज किया जाना चाहिए। अब भाजपा सत्ता में है और केंद्र सरकार ने अमेरिका से कड़ा ऐतराज जताया है, हालांकि यह परिस्थिति ऐसी है कि इसमें भारत सरकार के लिए कोई भी फैसला करना बहुत कठिन है। अमेरिका के नजदीकी मित्र देशों फ्रांस और जर्मनी की सरकारों की भी एनएसए ने जासूसी करवाई थी, मगर वे एक हद तक विरोध करने से ज्यादा कुछ नहीं कर पाए। अगर भारत सरकार चाहे, तो विरोध स्वरूप कुछ कड़े कदम उठा सकती है, लेकिन इसमें कई पेचीदगियां हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अमेरिका ने वीजा न देने का फैसला 2002 के गुजरात दंगों के सिलसिले में किया था। पिछले दिनों जब ऐसा लगा कि मोदी प्रधानमंत्री बन सकते हैं, तब अमेरिका ने उनसे संबंध सुधारने की कोशिशें शुरू कीं। मोदी की अमेरिका यात्रा भी तय हो चुकी है। ऐसे में, अमेरिका से रिश्ते बिगाड़ने के गंभीर नतीजे हो सकते हैं। देवयानी खोबरागडे़ मामले में भी रिश्ते खराब हुए थे, जब भारत सरकार ने अमेरिकी राजनयिकों पर कई प्रतिबंध लगा दिए थे। उस वक्त संप्रग-2 सरकार के आखिरी दिन थे और उसने रिश्ते सुधारने पर बहुत जोर नहीं दिया। यह सही है कि भारत जैसे देश को अमेरिका की मनमानी बर्दाश्त नहीं करनी चाहिए, लेकिन यह भी जरूरी है कि सटीक जवाब देने के बाद रिश्ते सुधारने की भी कोशिशें होनी चाहिए, क्योंकि स्थायी तौर पर अमेरिका से रिश्ते खराब करना अभी देश के हित में नहीं है।

अमेरिका इस वक्त दुनिया की एकमात्र महाशक्ति है और अक्सर उसका रवैया दूसरे देशों की सार्वभौमिकता की परवाह न करने वाला होता है। 9/11 के बाद अमेरिकी अपनी सुरक्षा को लेकर इतने घबराए हुए हैं कि वे उसके लिए कुछ भी करने को तैयार हैं। इसके अलावा, इस बीच सूचना तकनीक इतनी विकसित हो गई है कि एक ओर उसका इस्तेमाल कामकाज में प्रमुख स्थान ले चुका है, तो दूसरी ओर उसमें इसी टेक्नोलॉजी के जरिये सेंध भी लगाई जा सकती है। ऐसे में, अमेरिका के खिलाफ उचित जवाबी कार्रवाई करना तो जरूरी है, लेकिन इससे भी ज्यादा आवश्यक है कि हम अपने सुरक्षा इंतजाम को लगातार आधुनिक व सख्त करने को प्राथमिकता दें, ताकि जासूसों से दो कदम आगे रह सकें।

 

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