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महंगाई बढ़ाएगा कमजोर मानसून!

मानसून की लेटलतीफी और कमजोर रहने की सूचना से लोग आशंकित हैं। डर है कि यदि कृषि उत्पादन अच्छा नहीं हुआ तो कीमतें आसमान छूने लगेंगी। मानसून की देरी और उसके प्रभावों पर मदन जैड़ा का आकलन

रेल किराए, चीनी, पेट्रोल आदि की कीमतों में इजाफे से महंगाई की मार झेल रहे लोगों के लिए आने वाले दिन और मुश्किल भरे हो सकते हैं। जैसी संभावना है कि मानसून कमजोर रहेगा, अगर ऐसा हुआ तो उन्हें खाद्यान्न की कीमतों में भी बढ़ोत्तरी का सामना करना पड़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मानसून कमजोर रहा तो इससे कृषि उत्पादन प्रभावित होगा, जिसका असर खाद्यान्न वस्तुओं पर साल के आखिरी महीनों में दिखना शुरू होगा, लेकिन बाजार में कमजोर मानसून को लेकर अभी से अफवाहों का माहौल गर्म है। इसका नतीजा यह हुआ है कि खाद्य वस्तुओं की जमाखोरी शुरू हो गई है। सरकार की फौरी चुनौती इस जमाखोरी को रोकना है।

मानसून की अब तक की स्थिति को देखें तो उत्तर-पश्चिमी राज्यों में मानसून के आगमन में करीब एक-डेढ़ सप्ताह का विलंब हुआ है, लेकिन इन राज्यों में बड़े किसानों के पास सिंचाई की सुविधाएं हैं। इसलिए आरंभिक सूचना यह है कि अभी ज्यादा नुकसान नहीं हुआ है, लेकिन मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश में अपेक्षित मानसून की बारिश नहीं हो रही है। नतीजा यह है कि इन राज्यों में फसलों की बुवाई में विलंब हो चुका है। वहां किसानों को ज्यादा नुकसान हो रहा है।

कृषि विशेषज्ञों के अनुसार कमजोर मानसून के बावजूद कई मोर्चे पर हमारी तैयारी मजबूत है। एक ओर उत्तर भारत के तीन बड़े खाद्यान्न उत्पादक राज्यों पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में काफी हद तक सिंचाई वाली खेती है तो दूसरी ओर समय पर मानसून के कमजोर रहने की सूचना मिलने से सरकार को इस खतरे को कम करने की तैयारियों के लिए पर्याप्त समय भी मिल गया। कृषि से जुड़ी एजेंसियों ने किसानों को कम पानी वाली धान एवं दलहन की किस्में मुहैया कराईं। उन्हें वैकल्पिक और कम अवधि में तैयार होने वाली फसलें अपनाने को कहा गया है। कोशिश यह है कि कमजोर मानसून के खतरे को न्यूनतम किया जाए।

खाद्य मंत्रालय की मानें तो चिंतित होने की जरूरत नहीं है। देश में खाद्यान्न भंडार पर्याप्त है। फिर भी यदि कमजोर मानसून की वजह से सूखा पड़ता है और खाद्यान्न मंगाने की जरूरत पड़ती है तो विदेशों से लाने में कोई दिक्कत नहीं होगी, क्योंकि विदेशों में कहीं सूखे की खबर नहीं है। लेकिन इस समस्त प्रक्रिया में खाद्यान्नों की कीमतों को काबू रखना सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी। मुश्किल यह भी है कि भारत जैसे विशाल देश में सूखे की आहट से ही दुनिया के बाजारों में हलचल शुरू हो जाती है और दाम आसमान चढ़ने लगते हैं।

मानसून का इतिहास, मिजाज और पूर्वानुमान

- मानसून शब्द अरबी शब्द मौसिम से निकला है, जिसका अर्थ है हवाओं का मिजाज। हिन्द महासागर से उत्पन्न होने वाली खास हवाओं को मानसून कहा गया है।
- 16वीं सदी में मानसून शब्द का प्रयोग सबसे पहले समुद्र मार्ग से होने वाले व्यापार के संदर्भ में हुआ। दरअसल, भारतीय व्यापारी शीत ऋतु में मानसूनी हवाओं के सहारे व्यापार के लिए अरब व अफ्रीकी देशों में जाते थे और ग्रीष्म ऋतु में लौटते थे।
- शीत ऋतु में हवाएं उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पश्चिम दिशा में बहती हैं, जिन्हें शीत ऋतु का मानसून कहा जाता है, जबकि ग्रीष्म ऋतु में ये इसके विपरीत बहती हैं, जिसे दक्षिण-पश्चिम मानसून या गर्मी का मानसून कहा जाता है।
- इन हवाओं से व्यापारियों को नौकायन में सहायता मिलती थी, इसलिए इन हवाओं को व्यापारिक हवाएं या ट्रेड विंड भी कहा जाता है।
- पुराने जमाने में नावों में इंजन नहीं होते थे, लेकिन आज इंजन वाली नौकाओं के साथ जहाज भी आ गए हैं। इसके बावजूद ट्रेड विंड आज भी कारगर है। यदि विंड पैटर्न के हिसाब से कोई जहाज चल रहा है तो वह कम ईंधन खर्च करके ज्यादा गति से चल सकता है।
- पूर्व में न सेटेलाइट था और न ही राडार, लेकिन तब भी लोग पक्षियों के व्यवहार, हवाओं के पैटर्न व पेड़-पौधों के आधार पर मानसून के आगमन का आभास पा लेते थे। तब के पूर्वानुमान आज के आधुनिक पूर्वानुमानों की तुलना में खराब नहीं होते थे।
- मानसून की एंट्री एक जून को केरल से होती है। मानसूनी हवाएं बंगाल की खाड़ी से आगे बढ़ती हैं और हिमालय से
टकरा कर वापस लौटते हुए उत्तर भारत के मैदानी इलाकों को भिगोती हैं।

कम बारिश से आ सकती हैं मुश्किलें

खाद्यान्न की कमी
आने वाले दिनों में लोगों के सामने कमजोर मानसून से चार बड़ी मुश्किलें पैदा हो सकती हैं। इसका सबसे बड़ा प्रभाव कृषि उत्पादन पर पड़ेगा। उत्पादन घटा तो विदेशों से खाद्यान्न मंगाना पड़ेगा। इससे खाद्यान्न महंगे हो जाएंगे, जिसका असर सीधे आम आदमी की जेब पर पड़ेगा, जो पहले से ही महंगाई की मार झेल रहा है।

बिजली संकट
कम बारिश के कारण नदियों, बांधों के जलस्तर में भारी कमी आ जाएगी। अभी भी कई बांधों में पानी क्षमता से कम हो चुका है। नतीजा यह है कि वहां बिजली उत्पादन घटने लगा है। बिजली उत्पादन में कमी आने से बिजली कटौती बढ़ सकती है।

पानी का संकट
बारिश न होने से पेयजल का दोतरफा संकट होता है। एक तरफ तो नदी, नालों एवं तालाबों का पानी सूखने लगता है। दूसरी तरफ भूजल भी रीचार्ज नहीं हो पाता। इसका नतीजा यह हो सकता है कि आने वाले दिनों में भूजल का स्तर और नीचे चला जाए।

गर्मी से राहत नहीं
मानसूनी बारिश तपती धरती को गर्मी से राहत प्रदान करती है। यदि बारिश नहीं होगी तो लोगों को गर्मी से राहत भी नहीं मिल पाएगी, इसलिए बारिश कम होने से लोगों को भीषण गर्मी सहन करने के लिए तैयार रहना होगा। इसका असर स्वास्थ्य पर पड़ेगा।

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