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लक्ष्य पाने के लिए जरूरी है...स्वस्थ प्रतिस्पर्धा

लक्ष्य पाने के लिए जरूरी है...स्वस्थ प्रतिस्पर्धा

आज का समय प्रतिस्पर्धाओं से भरा हुआ है। हर जगह ही प्रतिस्पर्धा है, आखिर हो भी क्यों न! बात चाहे किसी उच्च संस्थान में प्रवेश लेने की हो या नौकरी के लिए किसी प्रतियोगी परीक्षा की, हर जगह सीटें कम हैं और उसमें शामिल होने वाले आवेदकों की संख्या कई गुणा अधिक। ऐसे में प्रतिस्पर्धा तो लाजिमी है ही।
   
विशेषज्ञों की मानें तो लक्ष्य को पाने के लिए प्रतिस्पर्धा का माहौल जरूरी है। यह छात्रों और किसी व्यक्ति को आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता है, उनमें जज्बा पैदा करता है। जिन्दगी में किसी भी मुकाम को हासिल करने के लिए यह अति आवश्यक है। अक्सर देखा गया है कि प्रतिस्पर्धा में छात्र बहुत सारी अहम चीजों को दरकिनार कर देते हैं, उनका मकसद सिर्फ सफलता प्राप्त करना होता है। इस सफलता को हासिल करने के फेर में वह कई ऐसी गलतियां कर बैठते  हैं, जिनका खामियाजा उन्हें ताउम्र झेलना पड़ता है। इसलिए जरूरी है कि प्रतिस्पर्धा के वक्त कुछ बातों पर विशेष ध्यान दिया जाए। लक्ष्य पाने के लिए प्रतिस्पर्धा के वक्त निम्न बातों का ध्यान रखना बेहद जरूरी है। इससे माहौल स्वस्थ और सुखद बनता है और सफलता प्राप्ति बेहद आसान हो जाती है।

प्रतिस्पर्धा हो स्वस्थ
लक्ष्य पाने के लिए प्रतिस्पर्धा का माहौल होना जरूरी है, लेकिन ध्यान रहे यह प्रतिस्पर्धा स्वस्थ हो। इसमें प्रतिस्पर्धी को मिटा कर या दबा कर आगे बढ़ने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। अक्सर छात्र खुद आगे बढ़ने के लिए दूसरों को नीचा दिखाने का कोशिश करते हैं, यह बिल्कुल गलत है। मैं आगे बढूं यह भाव जरूर होना चाहिए, पर दूसरा आगे न बढ़े या दूसरे को नीचा दिखाने का भाव नहीं होना चाहिए। ऐसा करने से नकारात्मक प्रवृत्ति बढ़ने लगती है। नकारात्मक प्रतिस्पर्धा बच्चों या छात्रों के लिए कई बार घातक साबित होती है।

तनाव और दबाव है घातक
अक्सर यह देखा गया है कि प्रतिस्पर्धा करते वक्त कई छात्र तनाव और दबाव में फंस जाते हैं। यह स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य, दोनों पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। छात्रों के साथ-साथ उनके माता-पिता और शिक्षकों की उनसे काफी उम्मीदें होती हैं। यह सारी उम्मीदें छात्रों पर अत्यधिक दबाव बनाने का काम करती हैं। छात्र की खराब परफॉर्मेस को देख कर माता-पिता नाखुश हो जाते हैं और शिक्षक भी निराश होते हैं। दोस्त भी नकारात्मक छवि बनाना शुरू कर देते हैं। ये सारी चीजें नहीं होनी चाहिए।
    
सफलता और असफलता एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। अगर किसी कारणवश छात्र को एक बार सफलता न मिले तो उस पर तनाव लेने की बजाए उन पहलुओं पर गौर करें, जहां गलतियां हुई हैं और उन गलतियों से सबक लेकर फिर से लक्ष्य पाने की तरफ कदम बढ़ाएं।

सामूहिकता की भावना जरूरी
प्रतिस्पर्धा के माहौल में खुद को अलग-थलग करके लक्ष्य को पाना उचित नहीं है। अगर परीक्षा में बेहतर करना हो तो पढ़ाई में अपने दोस्तों और शिक्षकों के बीच संवाद कायम रखें। उनके साथ अपनी समस्याओं पर चर्चा करें। अपने दोस्तों की अच्छाइयों से सीखें और अपनी उन खामियों पर काबू पाएं, जो लक्ष्य पाने में बाधक बन रही हैं। 

प्रतिस्पर्धा हो, प्रतिद्वंद्विता नहीं
जीवन में आगे बढ़ने और कुछ कर गुजरने के लिए प्रतिस्पर्धा में शामिल होने का मतलब यह नहीं कि दूसरे को प्रतिद्वंद्वी बना लें और उससे तुलना करके खुद को हीन या श्रेष्ठ साबित करें। ऐसी चीजें नकारात्मक भावना की ओर ले जाती हैं। यह कोई युद्ध नहीं है, जिसमें सामने वाला आपका प्रतिद्वंद्वी है। प्रतिद्वंद्वी मानने की होड़ के कारण ही कई बार छात्र अपने दोस्त या सहकर्मी के बारे में बुरे ख्यालों से भर जाते हैं। उसे किसी न किसी तरह का नुकसान पहुंचाने पर आमादा हो जाते हैं। ऐसा करना छात्र और उसके सहयोगी दोनों के लिए हानिकारक है।

लक्ष्य पर रखें निगाह
प्रतिस्पर्धा में शामिल होने के बाद लक्ष्य पर निरंतर ध्यान केंद्रित किए रखना जरूरी है। प्रतिस्पर्धा न हो तो पहले से और अच्छा करने का जज्बा पैदा नहीं होता। आप ढंग से तैयारी नहीं कर पाते। कुछ पाने की महत्वाकांक्षा भी कम हो जाती है। ऐसे में प्रतिस्पर्धा बेहद जरूरी है, लेकिन इसके साथ ही सबसे जरूरी है , प्रतिस्पर्धा में शामिल होकर लक्ष्य पर ध्यान रखते हुए उसे पाने का प्रयास करें।

सूचना और ज्ञान हासिल करें
लक्ष्य के साथ-साथ उसे पाने के लिए सूचना और ज्ञान से खुद को लैस करना भी जरूरी है। सूचना और ज्ञान के बलबूते ही छात्र धीरे-धीरे अपनी लक्ष्य प्राप्ति की ओर बढ़ता है। उचित मार्गदर्शन लेना भी जरूरी है, अन्यथा ज्ञान और सूचनाएं बेकार चली जाती हैं।
     
सही मार्गदर्शन में शिक्षकों या अभिभावकों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। इनके अलावा आप अपने सीनियर से भी मार्गदर्शन ले सकते हैं।

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