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सैनिकों के मुकाबले ड्रोन का इस्तेमाल कम खर्चीला

सैनिकों के मुकाबले ड्रोन का इस्तेमाल कम खर्चीला

ड्रोन फिर चर्चा में हैं। इराक में जारी संघर्ष में अमेरिका ने मानवरहित युद्धक विमान ड्रोन को उतारा है। हालांकि इराक में ड्रोन की भूमिका हमलावर की बजाय रक्षात्मक होगी। यानी युद्ध के मैदान पर मौजूद अमेरिका के सैन्य सलाहकारों के लिए ड्रोन सुरक्षा कवच के तौर पर काम करेंगे। ये ड्रोन हैलफायर मिसाइलों से लैस हैं और इन्होंने रविवार रात तिरकित के ऊपर उड़ान भी भरी। फिलहाल अशांत या युद्ध वाले इलाकों में ड्रोन के बढ़ते उपयोग ने एक नई बहस छेड़ दी है। वह यह कि लड़ाई के मैदान में ड्रोन और सैनिकों में कौन सस्ता पड़ता है और क्यों? 
     
यूनिवर्सिटी ऑफ तस्मानिया के अंतरराष्ट्रीय संबंधों के एसोसिएट लेक्चरर वाएने मेक्लीन ने ड्रोन और सैनिक उपयोग में होने वाले खर्चे का तुलनात्मक विश्लेषण पेश किया है। उनके मुताबिक सैनिकों के मुकाबले ड्रोन का इस्तेमाल कम खर्चीला होता है।

सैनिकों में बढ़ जाता है तनाव
20% अमेरिकी सैनिकों ने आत्महत्या की (इराक, अफगान लडमई लड़ने वाले)
50% अमेरिकी सेवानिवृत सैनिकों ने अक्षमता की अर्जी दाखिल की
08 में से एक अमेरिकी सैनिक हुए नशे के शिकार (2006 और 2008 में लड़ने वाले)

ड्रोन से अभियान पर खरचा कम
अमेरिकन सिक्यूरिटी प्रोजेक्ट के अनुसार पाकिस्तान में हमले के लिए एमक्यू-9 रीएपर ड्रोन का इस्तेमाल किया गया।
64.8 लाख अमेरिकी डॉलर एकल इकाई का खर्च आया
30.0 लाख अमेरिकी डॉलर अभियान की लागत पड़ी
3,250 अमेरिकी डॉलर प्रति घंटे उड़ान में खर्च होते हैं

चार रीएपर ड्रोन को संचालित करने के लिए दो पायलट, एक स्टेशन और एक सुरक्षित डाटा लिंक की जरूरत होती है। ड्रोन की तुलना में लड़ाकू विमान संचालित करने काफी महंगे साबित होते हैं। एक एफ-58 ज्वॉइंट स्ट्राइक फाइटर लड़ाकू विमान की कीमत करीब 9.1 करोड़ अमेरिकी डॉलर है। इसकी उड़ान पर हर वर्ष 50 लाख और हर घंटे 16,500 अमेरिकी डॉलर का खर्च आता है। यानी ड्रोन के मुकाबले लड़ाकू विमान संचालित करना पांच गुना महंगा होता है।

सहायता का किया ऐलान
पंजाब सरकार ने इराक के मोसुल इलाके में फंसे राज्य के 40 से अधिक लोगों के परिवारों के लिए 20 हजार रुपये प्रति माह की सहायता का एलान किया है। राज्य सरकार के एक प्रवक्ता ने मंगलवार को बताया, यह मदद इन परिवारों को तब तक मिलेगी जब तक इन्हें वित्तीय संकट से निकलने के लिए कोई दूसरा आदेश नहीं आ जाता। मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने मंगलवार को सभी उपायुक्तों से कहा कि वे इन परिवारों के पास व्यक्तिगत तौर पर जाएं और हरसंभव मदद मुहैया कराएं।

भारत ने फ्रांस से मांगी मदद
भारत ने इराक में सुन्नी चरमपंथियों द्वारा बंधक बनाए गए अपने 39 नागरिकों की रिहाई के लिए फ्रांस से मदद मांगी है। फ्रांस के विदेश मंत्री लॉरट फेबियस की यहां के नेताओं के साथ हुई बैठक में इस मुद्दे पर चर्चा की। वहीं, भारत ने कहा कि वह इस मसले पर सभी मानवीय संगठनों और देशों से सहयोग मांग रहा है। विदेश विभाग के प्रवक्ता सयैद अकबरुद्दीन ने कहा कि तिकरित में फंसी नर्सो के आसपास बमबारी हुई है, लेकिन वे सुरक्षित हैं।

वायुसेना की मदद संभव
योजना के मुताबिक वायुसेना इराक में फंसे भारतीय नागरिकों को निकाल कर उसके पड़ोस में स्थित कुवैत या संयुक्त अरब अमीरात जैसे सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने के लिए अपने विमानों का उपयोग कर सकती है, जहां से उन्हें वाणिज्यिक एयरलाइनें भारत लाएंगी।

सैनिकों से लड़ाई होती है महंगी
सैनिकों पर होने वाला खर्च अभी भी काफी अधिक है। उदाहरण के लिए वर्ष 2012 में अफगानिस्तान में अमेरिकी सरकार ने अपने सैनिकों पर 21 लाख अमेरिकी डॉलर खर्च किए थे। मेडिकल सेवाओं में सुधार की वजह से युद्ध में घायल हुए सैनिक आज पहले के मुकाबले कम मरते हैं। इराक और अफगान लड़ाई में सैनिकों की मौत और घायल होने का अनुपात 1:7 था जबकि द्वितीय विश्व युद्ध में 2.3 घायलों पर एक सैनिक और प्रथम विश्व युद्ध 3.8 घायलों पर एक सैनिक की मौत हुई थी।

घायल सैनिकों पर होता है अधिक खर्च
1558 मध्य-पूर्व में 13 साल चली लड़ाई के दौरान अमेरिकी सैनिकों के अंग काटे गए।
शोध के मुताबिक युद्ध में अब अधिक सैनिक घायल होते हैं, जिन्हें लंबे समय तक देखभाल की जरूरत होती है। इस पर खर्च भी ज्यादा होता है। 1,18,829 सैनिकों का तनाव दूर करने के लिए इलाज चला। हर वर्ष एक सैनिक पर औसतन 1,36,000 अमेरिकी डॉलर खर्च होते हैं। सभी खर्चों को जोड़ लिया जाए तो इराक-अफगान युद्ध पर अमेरिका को 836.1 अरब अमेरिकी डॉलर खर्च करने पड़े।

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