DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

सोशल मीडिया के गिनीपिग

बहुत सारी सुविधाओं और नए दौर में हमारी बहुत सारी जरूरतों को पूरा करने के बावजूद फेसबुक एक खतरनाक जगह भी है। ऐसे बहुत सारे मसले हैं, जिन पर आप अपनी बात किसी भी सड़क, चौराहे, नुक्कड़ पर खड़े होकर बिना किसी परेशानी के कह सकते हैं। लेकिन उसी बात को फेसबुक पर कहना मधुमक्खी के छत्ते में हाथ डालना साबित हो सकता है। कई बार लगता है कि वहां बहुत से लोग इसी इंतजार में घात लगाए बैठे रहते हैं कि आप मुंह खोलें और वे हल्ला बोलें। इस तरह के हल्ले सिर्फ वैचारिक विरोध ही नहीं होते, वे अपशब्द, लांछन और चरित्र हनन तक कहीं भी जा सकते हैं। फिर आप झुंझलाने और अपना सिर नोचने के अलावा कुछ कर भी नहीं सकते। सबसे बड़ी दिक्कत तमाम तरह की विचारधाराओं से जुड़े कट्टरपंथियों को लेकर आती है। आमतौर पर मुख्यधारा का मीडिया उन्हें ज्यादा भाव नहीं देता, इसलिए वे सोशल मीडिया को ही अपने कब्जे में लेने के अभियान में लगे दिखाई देते हैं। कोरा झूठ और इतिहास के नाम पर फरेब सोशल मीडिया में इस्तेमाल होने वाले उनके सबसे ज्यादा प्रचलित हथियार हैं।

दुनिया के किसी भी कोने में हुई दुर्घटना में मारे गए लोगों की तस्वीरों को दुनिया के किसी दूसरे कोने में हुए दंगे में मारे गए लोगों की तस्वीरों की तरह पेश कर दिया जाता है, और जब तक सच सामने आता है, उनका काम हो चुका होता है। इन्हीं हथियारों से वे हर किसी के दिमाग को बदल देना चाहते हैं। अगर आप फेसबुक पर थोड़ा-सा भी सक्रिय हैं, तो इनकी निर्दयता के दर्शन आप हर सुबह-शाम कर सकते हैं। कई बार लगता है कि सोशल मीडिया लोगों को जोड़ने के लिए है या उन्हें बांटने और लड़ाने के लिए? लेकिन अब पता चला है कि खुद फेसबुक भी यही कर रहा है। पिछले दिनों इसने कारनेल विश्वविद्यालय के साथ मिलकर फेसबुक इस्तेमाल करने वाले 6,89,003 लोगों के मिजाज पर पड़ने वाले फौरी असर का जो अध्ययन किया, उसे लेकर इन दिनों खासा हंगामा चल रहा है। फेसबुक ने इन लोगों को कई समूहों में बांटा और उनकी वॉल पर अलग-अलग तरह की पोस्ट और विज्ञापन देकर यह जानना चाहा कि इसका उनके व्यवहार पर क्या असर पड़ता है।

इस प्रयोग से जो नतीजे निकले, वे उतने महत्वपूर्ण नहीं हैं, जितने कि इस प्रयोग पर खड़े हो रहे सवाल हमारे लिए महत्वपूर्ण हैं। लेकिन पहले नतीजों की ही बात करते हैं। कुछ लोगों की वॉल पर तरह-तरह की सकारात्मक सामग्री परोसी गई और कुछ लोगों की वॉल पर सिर्फ नकारात्मक। नतीजा यह निकला कि जिन्हें सकारात्मक सामग्री परोसी गई, फेसबुक पर उनका व्यवहार अच्छा था और नकारात्मक सामग्री वालों के मामले में इसका एकदम उलट था। ये सारे लोग प्रयोग के दौरान फेसबुक इस्तेमाल कर रहे थे, बिना यह जाने हुए कि दरअसल फेसबुक उनका इस्तेमाल कर रहा है। फेसबुक पर उन्होंने कैसा व्यवहार किया, यह तो इस शोध में दर्ज हो गया, लेकिन इसके बाद अपने वास्तविक जीवन में क्या किया होगा, इसका रिकॉर्ड कहीं नहीं है। किसने सकारात्मक मूड में आकर अपनी पूरी महीने की बचत उड़ा दी होगी या किसने नकारात्मक मूड में आकर छोटी-सी गलती पर अपने बच्चे को झापड़ रसीद कर  दिया होगा, यह सब हम कभी नहीं जान पाएंगे।

बेशक, उनकी जिंदगी से हुए इस खिलवाड़ का असर फौरी ही रहा होगा, लेकिन इस मामले से उभरने वाली आशंकाएं बहुत बड़ी हैं। इस शोध में शामिल न्यूयॉर्क का कारनेल विश्वविद्यालय हालांकि एक निजी विश्वविद्यालय है, लेकिन उसके साथ विभिन्न क्षेत्रों के बहुत बड़े विद्वान जुड़े हैं और शोध के मामले में उसकी ख्याति भी काफी बड़ी है। लेकिन फेसबुक के इस शोध ने बता दिया कि इतनी प्रतिष्ठा के बावजूद कारनेल जैसे विश्वविद्यालय भी शोध की नैतिकता का खयाल नहीं रखते। आमतौर पर जो शोध चूहों, बंदरों, गिनीपिग वगैरह पर किए जाते हैं, उनके कुछ मापदंड तय कर दिए गए हैं। कई जगह इन मापदंडों का भी पूरा खयाल नहीं रखा जाता, लेकिन इसे गंभीर मसला नहीं माना जाता। लेकिन अगर शोध मनुष्यों पर होता है, तो इसे काफी गंभीर मसला माना जाता है। इसकी एक आधारभूत शर्त होती है कि जिस पर यह शोध या प्रयोग हो रहा है, उसकी लिखित सहमति जरूर ली जाए, इसके अलावा उसे शोध के खतरों के बारे में भी बता दिया जाए। चिकित्सा वगैरह कई मामलो में तो ऐसे शोध नियामक संस्थाओं की इजाजत के बगैर किए ही नहीं जा सकते।

फेसबुक के इस शोध पर सबसे बड़ी आपत्ति यही है कि जिन पर यह शोध हुआ, उन्हें यह एहसास भी नहीं था कि वे गिनीपिग बनाए जा रहे हैं। हालांकि यह सवाल भी पूछा जा सकता है कि फेसबुक का हमारी जिंदगी पर क्या असर पड़ता है, इसके लिए इतने लंबे शोध की क्या जरूरत थी? इसके तो बहुत सारे उदाहरण पहले ही हमारे पास हैं। अभी ज्यादा वक्त नहीं हुआ, जब फेसबुक की एक पोस्ट के कारण मेरठ में दंगा होते-होते बचा था। ऐसे कई मामले जानकारी में आ चुके हैं, जब फेसबुक के कारण सांप्रदायिक तनाव पैदा हो गया। वैसे अरविंद केजरीवाल और नरेंद्र मोदी की जीत का श्रेय भी कुछ लोग सोशल मीडिया पर बनाए गए माहौल को देते हैं। लेकिन जब खुद फेसबुक यही करता है, तो मामला बदल जाता है। यह कुछ ऐसे ही है, जैसे तंबू-कनात उपलब्ध कराने वाला यह तय करने लगे कि आज की पार्टी में आप कौन-सी धुन पर नाचेंगे।

बेशक, यह एक हल्का उदाहरण है, इसे लेकर कई खतरनाक कल्पनाएं की जा सकती हैं, और वे महज कोरी आशंका ही नहीं होंगी। असल समस्या यह है कि जब व्यावसायिक हितों को साधने के लिए हमारी निजता में सेंध लगनी शुरू होती है, तो आप इसकी आखिरी हद नहीं तय कर सकते। इंटरनेट और सोशल मीडिया युग में लोगों की निजता बचाना सबसे बड़ी चुनौती है। यह ऐसा काम है, जिसके न तो हम मुकम्मल तौर-तरीके बना सके हैं और न ही उन्हें लागू करने वाली असरदार संस्थाएं।

इस साल मई में यूरोप की उच्च अदालत ने जब गूगल से कहा कि लोग उसकी साइट पर क्या सर्च कर रहे हैं, वह इसका रिकॉर्ड दर्ज करना बंद करे, और पहले से दर्ज रिकॉर्ड को डिलीट करे, तो मजबूरन यूरोप में उसे यह काम करना पड़ा, लेकिन बाकी दुनिया में यह काम पहले की तरह ही जारी है। इंटरनेट पर निजता का मामला ऐसा है, जिसे किसी एक देश या क्षेत्र के कानूनों और संस्थाओं से नहीं बचाया जा सकता। इसके लिए विश्व-व्यापी स्तर के जिस प्रयास की जरूरत है, वह दुनिया में कहीं नहीं हो रहा। हमें एक और बात भी याद रखनी होगी कि लोगों के मूड और व्यवहार को बदलने वाला व्यावसायिक शोध कोई पहली बार नहीं हुआ है, इस बार हंगामा सिर्फ इसलिए हो रहा है कि इसका खुलासा हो गया।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:सोशल मीडिया के गिनीपिग