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महंगाई को नौजवान नजरों से देखें

अब मोबाइल फोन, पाजामे और स्कूल यूनिफॉर्म के भाव भी महंगाई नापने के सूचकांक में शामिल होंगे। वैसे महंगाई के सूचकांक सबके लिए अलग-अलग होने ही चाहिए, क्योंकि महंगाई सबके लिए अलग-अलग होती है। गुप्ता आंटी सिर धुनती हैं कि हाय, आलू-टमाटर के आसमान छू रहे भाव। गुप्ताजी का बेटा प्रसन्न-मगन होता है कि स्मार्ट फोन सस्ता हो रहा है। बेटों के लिए तो सस्ताई है, मम्मी के लिए महंगाई है। महंगाई के आंकड़ों को अलग-अलग वक्त लिया जाए, तभी फर्क दिखता है। जैसे एक बंदा अपनी गर्लफ्रेंड के साथ किसी मॉल के सिनेमा हॉल में है, कोल्ड ड्रिंक बाजार भाव से दोगुने भाव पर उन्हें बेची जा रही है। फिर भी नौजवान यही कहेगा कि न, कतई महंगी नहीं है यह। सौ में सौ बंदे यही कहेंगे। वही बंदा छह महीने के बाद उसी मॉल के उसी हॉल में उसी गर्लफ्रेंड को पत्नी बनाकर आए, तो दोगुने भाव पर बिकने वाली कोल्ड ड्रिंक पर चीख उठेगा-हाय, कित्ती महंगाई है। सौ में से नब्बे नौजवान बतौर पति यही कहेंगे।

गर्लफ्रेंड के सामने ‘नो’ महंगाई, पत्नी के साथ जबर्दस्त महंगाई है। महंगाई के इस सापेक्षता सिद्धांत को जानने के लिए आइंस्टीन होना जरूरी नहीं है। मंत्रियों के बस में नहीं कि महंगाई कम कर दें, यह काम देश के बॉयफ्रेंड्स ही कर सकते हैं। भारत नौजवानों का देश है। करीब पचास प्रतिशत आबादी पच्चीस साल की उम्र से नीचे की है, इसलिए महंगाई कम दिखाने की अपार बॉयफ्रेंडात्मक संभावनाएं हैं। पांच सौ रुपये का पिज्जा बच्चों को सस्ता दिखता है, 38 रुपये का फुल एक किलो आटा मम्मी को महंगा दिखता है। अपनी जेब से खर्च करना पड़े, तो 38 रुपये का किलो आटा महंगा लगता है, पापा की जेब से जाना हो, तो 500 का पिज्जा भी सस्ता लगता है। दादी तो 500 रुपये का पिज्जा सुनकर बेहोश हो जाएं और बताने लगें कि इतने के दहेज में तो चंदू की शादी हो गई थी, महंगाई के आंकड़े सबके लिए अलग-अलग हैं। तो फिर किया क्या जाए? दो ही रास्ते हैं या तो नौजवानों को कम उम्र में अपनी कमाई के लिए प्रेरित किया जाए या मम्मी-पापा जैसों से कहा जाए कि महंगाई को नौजवान नजरों से देखो न।

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  • Web Title:महंगाई को नौजवान नजरों से देखें