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आखिर वह ‘शहर’ बन गया

मेरे शहर का मौसम बदल गया है। पहले जो मेरा मोहल्ला होता था, वह अब ‘कॉलोनी’ है। पहले यहां के बच्चे अपने मुहल्ले के झा चाचा, कर्ण चाची, महतो भैया और रामेसर काका इत्यादि को हाथ की उंगली की तरह पहचानते थे, लेकिन अब बगल वाले घर में कौन-सा परिवार रहने आया है, हम नहीं जानते? महज 10-12 साल पहले तक, जब इस मुहल्ले के किसी लड़के को गुटखा भी खाना होता था, तो वह छिपकर जाता था। अब इसी कॉलोनी की चौक पर जाम टकराए जाते हैं- खुलेआम। हमारे इस मुहल्ले में एक पुराना मंदिर था। आस्था की छोड़िए, वह सामाजिक गतिविधियों का केंद्र भी था। वहां अब दो-चार जुआ खेलने वालों के अलावा कोई नहीं जाता। मंदिर के ठीक सामने का पोखर आधा भर दिया गया है और सबकी मौन सहमति से बाकी बचे को पूरी कॉलोनी का कूड़ेदान बना दिया गया है।

पोखर के आसपास की जमीन के टुकड़ों की प्लॉटिंग कर उस पर अट्टालिकाएं खड़ी हो गई हैं। जिस मैदान की छाती को कूटकर ये इमारतें बनाई गई हैं, वहीं कहीं हमारा बचपन भी दफ्न है। अब मुहल्ले के लड़कों को खेलने के लिए मैदान नहीं मयस्सर है। वैसे, अब इसकी जरूरत भी नहीं। ज्यादातर घरों में केवल बूढ़े ही बच गए हैं, जवान अपने बच्चों सहित दिल्ली-मुंबई-बेंगलुरु-हैदराबाद निकल गए हैं। हमारा शहर अब सचमुच शहर हो गया है। यहां तीन मॉल खुल गए हैं। अपार्टमेंट संस्कृति आ गई है। जहां भूले-भटके अपराध की घटनाएं होती थीं, अब वे रोजाना की बात हैं। शहर बड़ा ‘हैपनिंग’ हो गया है।
जनपथ में व्यालोक

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