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सही राह पर

पर्यावरण के मोर्चे पर ढिलाई के तमाम आरोपों के बीच नेपाल सरकार ने चुरे पहाड़ी को पारिस्थितिक संरक्षण क्षेत्र घोषित किया है। इसका अर्थ है- वहां वनों की कटाई, खनिज पदार्थों और बालू-पत्थर के खनन पर तत्काल पाबंदी; वन्य-जीवों को नुकसान पहुंचाने वाले किसी भी तरह के क्रिया-कलाप पर रोक तथा क्षेत्र में अवैध हस्तक्षेप या प्रवेश पर प्रतिबंध। राष्ट्रपति चुरे-तराई मधेस संरक्षण विकास समिति के गठन के बाद यह निर्णय लिया गया, जो राष्ट्रपति चुरे संरक्षण कार्यक्रम का पुनर्गठित रूप है। साल 2010 में इसे राष्ट्रपति रामबरन यादव ने बनाया था। नई समिति ने चुरे संरक्षण में तराई-मधेस इलाके को भी शामिल किया है, जिससे इस पूरे क्षेत्र को लेकर एक विस्तृत नजरिया बनेगा।

अब यह समिति भौगोलिक बनावट, मौजूदा दर्जा और खनिज व अन्य संसाधनों के दोहन तथा संरक्षण के लिए वैज्ञानिक आंकड़ों का इस्तेमाल करेगी। चुरे का क्षेत्र पूरब में इलाम से लेकर पश्चिम में कंचनपुर तक फैला हुआ है। यह निचले इलाकों और तराई में मौजूद 36 पहाड़ियों का कुल 12 प्रतिशत हिस्सा है। ये पहाड़ियां अपनी पर्यावरणीय विविधता के लिए जानी जाती हैं। कई हजार साल पहले से ये पहाड़ियां ‘अनुपयोगी’ मानी जाती रही हैं। इसलिए ये खेती-किसानी और बसावट से दूर रहीं। लेकिन बीते दशकों से चुरे की पहाड़ियों को नंगा किया जा रहा है, उनके सीने में समाए खनिजों का दोहन हो रहा है। पड़ोसी देश भारत में कच्चे माल की मांग बढ़ती जा रही है, क्योंकि वहां निर्माण-क्षेत्र में जबर्दस्त उछाल आया है। इसलिए भी चुरे क्षेत्र का अत्यधिक दोहन हो रहा है। यह मांग इमारती लकड़ियों की है, बालू व गोल-पत्थरों की है, जो इन पहाड़ियों में प्रचुर मात्रा में हैं और जिनको यहां से ले जाना भी आसान है। प्रभावी नियामक संस्थाओं और नीतियों के अभाव में बहुमूल्य संपदाओं से लदे हजारों ट्रक हर रोज सीमा के पार भेजे जाते हैं। वन व भूमि-संरक्षण मंत्री महेश अचार्य मानते हैं कि काफी क्षति हो चुकी है। मगर अब भी बहुत देर नहीं हुई है। उम्मीद की जानी चाहिए कि नई समिति उस राह पर नहीं जाएगी, जिस राह पर पिछला राष्ट्रपति चुरे संरक्षण कार्यक्रम था।   
द काठमांडू पोस्ट, नेपाल

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