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भारतीय-अमेरिकी वैज्ञानिक के नाम पर पर्वत का नाम

भारतीय-अमेरिकी वैज्ञानिक के नाम पर पर्वत का नाम

अमेरिका ने अंटार्कटिका के एक पर्वत का नामकरण एक प्रतिष्ठित भारतीय-अमेरिकी वैज्ञानिक के नाम पर किया है। यूनिवर्सिटी ऑफ मिन्नेसोटा में डिपार्टमेंट ऑफ जेनेटिक्स, सेल बायोलॉजी एंड डेवलपमेंट में सहायक प्रोफेसर रहे अखौरी सिन्हा के नाम पर अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण ने पर्वत का नामकरण माउंट सिन्हा रखा है। वर्ष 1971-72 में किए गए उनके कार्य के लिए अमेरिकी भूगर्भ सर्वेक्षण ने उन्हें सम्मानित किया है।

सिन्हा उस दल के सदस्य थे, जिन्होंने वर्ष 1972 और 1974 में बेलिंगशॉसेन और आमंडसेन समुद्री क्षेत्र में अमेरिकी कोस्ट गार्ड कटर्स साउथविंड और ग्लेशियरों में सील, व्हेल और पक्षियों की सूचीबद्ध गणना की थी। इस पर्वत का नामकरण अंटार्कटिक नेम्स (यूएस-एसीएएन) और अमेरिकी भूगर्भ सर्वेक्षण की सलाहकार समिति द्वारा किया गया।
   
माउंट सिन्हा पर्वत (990 मीटर) मैकडोनाल्ड पर्वत श्रृंखला के दक्षिणी हिस्से एरिकसन ब्लफ्स के दक्षिण पूर्वी छोर पर स्थित है। सिन्हा ने कहा कि कोई भी गूगल डॉट कॉम या बिंग डॉट कॉम पर माउंट सिन्हा को देख सकता है।

अखौरी सिन्हा ने कहा कि यह सम्मान यह दिखाता है कि आप सक्षम हैं इसलिए आज लोगों से संपर्क करने से नहीं डरना चाहिए और हर अवसर को आजमाना चाहिए। सिन्हा ने वर्ष 1954 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से विज्ञान में स्नातक की डिग्री हासिल की थी। इसके बाद उन्होंने वर्ष 1956 में पटना विश्वविद्यालय से प्राणी विज्ञान में स्नातकोत्तर की डिग्री ली। सिन्हा ने कहा कि उन्हें नेशनल साइंस फाउंडेशन अंटार्कटिक प्रोग्राम द्वारा अंटार्कटिक के सीलों के प्रजनन पर शोध के लिए आमंत्रित किया गया था।
   
अमेरिका आने से पहले उन्होंने रांची कॉलेज में नवंबर 1956 से जुलाई 1961 तक प्राणी विज्ञान विभाग में अध्यापन भी किया था। सिन्हा ने बताया, वर्ष 1972 और 1974 में मैं 22 सप्ताह के लिए यूएस कोस्ट गार्ड कटर्स, साउथविंड और ग्लेशियर पर दो अभियानों के लिए गया था।
   
सिन्हा के 100 से ज्यादा पत्र प्रकाशित हुए हैं और उन्होंने लगभग 25 वर्ष तक स्नातक स्तर के पाठ्यक्रमों में अध्यापन का कार्य किया है। सिन्हा ने बताया कि वर्ष 1739 में ईरान के नादिर शाह द्वारा दिल्ली पर आक्रमण के बाद उनके पूर्वज दिल्ली से बिहार के बक्सर आकर बस गए थे। उन्होंने बताया, फरवरी में मिन्नेसोता की सर्दी से बचने, संबंधियों से मिलने, गांव के दोस्तों और अन्य लोगों से मिलने के लिए मैं लगभग हर साल अपने गांव (चुरामनपुर) जाता हूं।

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