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ठेकेदार चले बिहार

ौसी परिस्थतियां बनती जा रही हैं वह झारखंड के लिए अच्छे संकेत नहीं। ठेकेदारों का रुख बिहार समेत दूसर नये राज्यों की ओर होने लगा है। ग्रामीण सड़क योजना हो या पथ निर्माण की बड़ी योजना, टेंडर लटकने लगे हैं। कई ठेकेदारों ने बिहार में करोड़ों का काम ले रखा है। कुछ हालात से कुछ सिस्टम से खफा होकर बिहार में रमने लगे हैं। कई नामी- गिरामी कंपनियों ने पहले ही घूस से मुंह मोड़ा और झारखंड छोड़ा है। पीएमजीएसवाइ, ग्रामीण इलाकों में पुल-पुलियों तथा सड़क निर्माण का काम करने वाले छोटे ठेकेदार भी बिहार की ओर निकल गये हैं।ड्ढr नक्सली गतिविधियां और लेवी के दबाव से भी ठेकेदार यहां से खिसक रहे हैं। हाल ही में पीएमजीएसवाइ के पांचवें चरण के लिए 172 पैकेा में टेंडर मांगा गया था। 1पैकेा में एक भी टेंडर नहीं पड़ा। 1में किसी ने क्वालिफाइ नहीं किया और 13 पैकेा में सिंगल टेंडर पड़ा। बड़ी योजनाओं में भी कमोबेश यही हालत है। ये संकेत अच्छे नहीं हैं। इंजीनियर भी मानते हैं कि कार्य विभागों में अच्छे ठेकेदारों की कमी महसूसा जा रहा है। प्रधान कंस्ट्रक्शन, नव निर्माण, डोकानिया, नरसरिया कंस्ट्रक्शन, सिंह एंड ब्रदर्स, हरदेव सिंह, सीआइएसी जसी कंपनियों को बिहार में करोड़ों का काम मिला है। भारत सरकार का प्रतिष्ठित उपक्रम बामा -लाउरी ने भी झारखंड से मुंह मोड़ लिया है। पुल निर्माण में साख वाली कई कंपनियां भी बिहार में दिलचस्पी ले रही हैं।ड्ढr बातचीत में कंपनियों के प्रतिनिधियों का कहना है कि इमानदारी और इस्टीमेट से काम करने के लिए अब झारखंड मुफीद नहीं। सेटिंग- गेटिंग का खेल बहुत है। नाम कितना हो, अंडर डीलिंग बायपास कर काम लेना संभव नहीं। वैसे बड़े नाम वाली कई कंपनियां विभिन्न प्रोजेक्ट पर जरूर काम कर रही हैं। पर सबलेटिंग ज्यादा है। क्वालिटी तथा समय सीमा पर काम की कोई गारंटी भी नहीं।ड्ढr

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