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कर दिया कमाल

हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी विशु शिकार के मौके पर आदिवासी शिकारी झुंड के झुंड दलमा में जमा हुए। लेकिन, इस बार उद्देश्य भिन्न था। कल तक, इस परंपरागत विशु शिकार पर हर साल हाारों निरीह वन्यजीवों की जान ली जाती थी, इस बार उनके संरक्षण की कसमें ली गयीं। शिकारी और अहिंसा! वाकई चौंकाती है। लेकिन, यह हुआ। कैसे?ड्ढr उस अंतर्कथा पर भी एकबारगी विश्वास नहीं होता कि यह सब कर दिखाया है एक सरकारी महकमा ने, उसके एक अकेले अधिकारी की प्रेरणा ने। आदिवासियों के सदियों पुराने विशु शिकार के सामने अबतक देश के तमाम वन और पर्यावरण संरक्षण कानून बौने थे। साल के इस एक दिन परंपरा और रिवाज के नाम पर हाारों निरीा पशु-पक्षी मौत के घाट उतार जाते रहे हैं। जमशेदपुर के निकट 1वर्गकिलोमीटर में फैला दलमा जंगल हांथी, हिरण, वनैले सूअर, कोटरा (जंगली बकरी), आदि पशु और अनेक प्रजातियों के पक्षियों के लिये आश्रयणी रहा है। सुगम्य होने के कारण विशु शिकार करनेवालों के लिये यह सुलभ लक्ष्य रहा। इस बार भी, 12 मई को विशु शिकार के अवसर पर तीर-धनुष थामे शिकारी जमा हुए, लेकिन वनैले पशुओं का सेंदरा करने नहीं, उनकी सुरक्षा के लिये। यह विस्मयकारी खुशनुमा अवसर रातों रात नहीं, तीन महीनों की मेहनत का नतीजा था। एक पूरी रणनीति थी। रणनीति के प्रणेता, सिद्धार्थ त्रिपाठी विस्तार से बताते हैं वह अंतर्कथा। त्रिपाठी झारखंड वन विभाग में वन प्रमंडल पदाधिकारी हैं। दलमा आश्रयणी में कुल 82 गांव हैं। 2गांव आश्रयणी के अन्दर हैं और शेष 53 गांव इसकी सीमा पर। बाहर से आने वाले शिकारी इन्हीं गांवों में ठहरते थे, और स्थानीय लोगों की मदद से शिकार करते थे। पिछले वर्ष दस हजार लोग विशु शिकार के दिन आश्रयणी में घुसे थे। इनमें से लगभग पांच हजार बाहर से आये शिकारी थे और पांच हजार स्थानीय लोग थे। बाहरियों में झारखंड ही नहीं पश्चिम बंगाल के सीमावर्ती इलाके के शिकारी होते थे। प्रमंडल पदाधिकारी त्रिपाठी ने वनजीव संरक्षण के लिए स्थानीय लोगों को प्रेरित करन की योजना बनायी। स्थानीय लोग मान गए, बाहरियों की नहीं चलेगी। तीन महीनों तक इसी रणनीति पर काम हुआ। ड्ढr

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