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चार बरस, चालीस गांठें

संप्रग सरकार अपनी चौथी वर्षगांठ मना रही है। यह सिर्फ एक सरकार की नहीं वरन् बनते-बिगड़ते कई समीकरणों की भी चौथी वर्षगांठ हैं। सबसे पहले कांग्रेस के भीतर उस व्यवस्था की जिसमें प्रधानमंत्री का ताज किसी और के सिर पर है और पार्टी की लगाम किसी और के हाथ में। अब तो वफादारी को ओढ़ने- बिछाने वाले कांग्रेसियों ने भी इसे स्वीकार करना सीख लिया है। कुछ ने मजबूरी में और कुछ ने उपयुक्त मौके की तलाश में। एक दूसरी तरह से देखें तो यह कांग्रेस के पचमढ़ी संकल्प के अंतिम संस्कार की भी पांचवीं बरसी है, जिसमें कांग्रेस ने एकला चलो र का नारा लगाया था। यह गठबंधन की हकीकत के आगे अतीत के गौरव और अपनी जमीनी ताकत पर इठलाने वाली कांग्रेस के आत्मसमर्पण की भी चौथी वर्षगांठ है। पिछले डेढ़ दशक से ज्यादा समय से देश गठबंधन के भरोसे ही चल रहा है। न सिर्फ चल रहा है तेजी से आगे भी बढ़ रहा है। यह उस वामपंथी जिद के टूटने की भी चौथी वर्षगांठ है, जो ताल ठोंक कर ऐलान करती थी कि वह भाजपा और कांग्रेस से हमेशा ही समान दूरी बनाए रखेगी और याद कीािए कि चार साल पहले जब यह सरकार बनी थी तो समाजवादी पार्टी के लोग उस जश्न के अनचाहे मेहमान वाली हिकारत के पात्र बने थे। चार साल बाद अब वही नेता मौकाए-ाश्न की अगली पांत की शोभा बढ़ाएंगे। बात सिर्फ इतनी सी है कि ये चार साल वैचारिक कट्टरताओं के खोल से निकलकर जमीनी हकीकत को पहचानने और उसके हिसाब से खुद को ढालने के साल हैं। ये चार साल हमने एक ऐसे प्रधानमंत्री के साथ बिताए हैं जो एक विनम्र-सा अर्थशास्त्री है। जो किसी भी कोने से परंपरागत राजनीतिक नहीं है, इसलिए हर दिन यह साबित करता है कि अरस्तु का फिलास्फर किंग वाला विचार कोरा यूटोपिया नहीं है। भले ही आप उन्हें बहुत कामयाब न मानें लेकिन आप उन्हें आजाद भारत के साठ साल के इतिहास के नाकाम नेताओं की फेहरिस्त में भी शामिल नहीं कर पाएंगे। वे देश के पहले प्रधानमंत्री हैं जो शायद अपना पूरा कार्यकाल राज्यसभा सदस्य रहकर ही खत्म कर देंगे। अच्छा या बुरा - इस लिहाज से यह हमार लोकतंत्र का एक नया अध्याय भी है। हालांकि परीक्षा की घड़ी एक साल बाद आएगी, जब मनमोहन सिंह को यह साबित करना होगा कि वे सिर्फ सरकार ही नहीं चला सकते, चुनाव भी जिता सकते हैं।

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