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आयुव्रेद को नहीं मिल रहा उचित बढ़ावा

भारत सरकार की ओर से आयुव्रेद को जितना बढ़ावा मिलना चाहिए, उतना नहीं मिल रहा। सरकार के हैल्थ बजट का छह प्रतिशत से भी कम देसी पद्धतियों पर खर्च होता है, जो ऊंट के मुंह में जीरे के समान है। यही कारण है कि आयुव्रेदिक कॉलेजों की हालत भी बहुत खस्ता है। कई आयुव्रेदिक कालेजों की मान्यता भी रद्द की जा चुकी है। इससे आयुव्रेदिक शिक्षा को प्रोत्साहन नहीं मिल पा रहा। वैद्यनाथ के कार्यकारी निदेशक श्री अनुराग शर्मा ने हिन्दुस्तान को विशेष साक्षात्कार में उक्त तथ्य सामने रखने के अलावा यह भी बताया कि ने पिछले कई सालों से बहुत सारी आयुव्रेदिक दवाओं का फार्मोकोपिया तक जारी नहीं हुआ। न ही आयुव्रेदिक दवाओं के मानकीकरण का बड़ा प्रयास हुआ है। अगर विदेशों में आज आयुव्रेदिक दवाएं पर्याप्त लोकप्रियता हासिल नहीं कर पातीं, तो यह इसकी बड़ी वजह है। उन्होंने कहा कि बड़ी आयुव्रेदिक दवा निर्माता कपंनियां तो अंतरराष्ट्रीय मानकों का ख्याल रख पाती हैं, हम विदेशों में उन्हें पंजीकृत भी करवा लेते हैं। लेकिन फार्मोकोपिया के अभाव में छोटी आयुव्रेद दवा कंपनियों के लिए समस्याएं होती हैं। दूसरा समुचित सरकारी व्यवस्था न होने से आज आयुव्रेदिक दवाओं पर किसी किस्म का रगूलेटरी नियंत्रण नहीं और आयुव्रेदिक दवाएं घटिया कह कर विदेशों में रद्द कर दी जाती हैं। सेंट्रल कोसिल फॉर रिसर्च इन आयुव्रेद एंड सिद्धा के एक अधिकारी ने इस बार में सफाई दी कि सरकार अब तक फार्मोकोपिया के पांच खंड जारी हो चुके हैं और छठा खंड प्रकाशित होने जा रहा है। 50 कंपाउंड फामरूलेशन की फार्मोकोपिया भी प्रकाशित हो चुकी है। लेकिन आयुव्रेद की एक लाख दवाएं हैं जिनमें से सिर्फ अभी 600-700 दवाओं का ही मानकीकरण किया जा सका है।ड्ढr आयुव्रेदिक दवाएं महंगी क्यों होती जा रही हैं? इस सवाल के जबाव में श्री अनुराग शर्मा ने बताया कि एलोपैथिक दवाओं की तुलना में आयुव्रेद दवाएं आज भी सस्ती हैं लेकिन कई औषधीय वनस्पतियां जसे प्रवाल, शिलाजीत, अतीस आदि लुप्त होता जा रही हैं जिसकी वजह से इनसे बननेवाली दवाएं भी महंगी हो रही हैं।ड्ढr ये ज्यादातर वनस्पतियां नेपाल,अफगानिस्तान और हिमालय में पैदा होती हैं। सोना के महंगे होने से स्वर्णभस्म से बननेवाली दवाएं भी महंगी हो रही हैं।ड्ढr

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