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पाकिस्तान : जजों की बहाली पर उलझी सियासत

संकट जिसमें नवाज शरीफ को अपने मंत्रियों से इस्तीफा दिलवाना पड़ा। हालांकि इस्तीफे के बावजूद सरकार को समर्थन जारी रखन की घोषणा से उम्मीद की डोर बची हुई है, लकिन मतभेद आगे चौड़ा नहीं होगा, ऐसा मान लेन का कोई ठोस आधार नहीं है। सामान्य नजरिए से यह स्वीकार किया जा सकता है कि नवाज के सामने दूसरा विकल्प नहीं बचा था। बर्खास्त न्यायाधीशों की पुनर्बहाली उनकी पार्टी का मुख्य चुनावी वायदा था और जब दो बार समय-सीमा निर्धारित करन के बावजूद ऐसा नहीं हो सका तो अपनी साख बचान के लिए उन्हें यह कदम उठान को विवश होना पड़ा। उनकी पार्टी पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज) के प्रवक्ता न कहा भी कि हमारी साख दांव पर है। लोग हमें धोखेबाज कहेंगे। इस समय तो मंत्रियों का इस्तीफा दिलवाकर रक्षा कर ली गई। आगे बर्खास्त न्यायाधीशों का मसला हल नहीं हुआ तो वे क्या करेंगे? तब साख कैसे बचेगी? क्या वे तब भी जम्हूरियत कायम रहन के नाम पर सरकार का समर्थन जारी रखेंगे? दूसरी ओर भी शरीफ की साख का प्रश्न खड़ा है। वे अस्थिरता तथा शीघ्र चुनाव में देश को झोंकन का कलंक अपने माथे नहीं लेना चाहते। इतन कम समय में गले मिलने और अलग होने से भी शरीफ की निजी राजनीतिक साख को धक्का लग सकता है। उन्होंने इस्लामाबाद में मंत्रियों के इस्तीफे का ऐलान करते समय कहा भी कि व कोई राजनीतिक संकट खड़ा नहीं करना चाहते। बावजूद इसके गतिरोध बढ़ गया तो फिर आग कोई चमत्कार हो जाएगा और वह दोनों के लिए सहज स्वीकार्य होगा, ऐसी आशा कैस की जा सकती है! जरदारी ने लंदन में कहा कि किसी एक गैर संवैधानिक कदम का अंत दूसरे गैर संवैधानिक कदम से नहीं किया जा सकता। जरदारी के बयान से किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। 3 नवंबर 2007 को आपातकाल लागू करन के बाद राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ द्वारा बर्खास्त 60 न्यायाधीशों के मुद्दे पर जरदारी एवं शरीफ की सोच में दो ध्रुवों का अंतर है। जरदारी न्यायाधीशों को लोकतंत्र का रक्षक मानते ही नहीं। इन न्यायाधीशों ने ही उन्हें सजा दी थी। यही नहीं जब मुशर्रफ ने बेनजीर और उनके मुदकमे वापस लेन का अध्यादेश जारी किया तो उसके खिलाफ याचिका स्वीकार करन का फैसला उच्चतम न्यायालय के बर्खास्त मुख्य न्यायाधीश इफ्तिखार चौधरी ने ही लिया। जरदारी ने गठबंधन सरकार की मजबूरी में ही इनकी पुनर्बहाली को सिद्धांतत: स्वीकार किया, लकिन प्रक्रिया एवं समय सीमा से उनकी सहमति नहीं हो सकी। इसमें एक मसला आपातकाल के अस्थायी संविधान के तहत शपथ लेकर काम कर रहे मौजूदा न्यायाधीशों का भी है। 1 मई को नवाज ने ऐलान किया था कि उनको व कड़ुवे घूंट की तरह स्वीकार कर लेंगे लकिन अब उस पर भी मतभेद पैदा हो चुके हैं। उन सबको बनाए रखन का अर्थ मुशर्रफ के आपातकाल को सही मानना होगा। दूसरे, अगर ये न्यायाधीश कार्यरत रहेंगे तो जिनकी पुनर्बहाली होगी उनका ओहदा कैसे तय होगा? जरदारी ऐसे गंभीर मामले में जल्दबाजी नहीं चाहते। इसके पीछे उनका राजनीतिक व्यवहारवाद भी है। न्यायाधीशों की पुनर्बहाली का राजनीतिक निहितार्थ भी है। इफ्तिखार चौधरी ने मुशर्रफ के चुनाव लड़ने की पात्रता से संबंधित मुकदमे स्वीकार किए थे। 3 नवंबर से पीछे जान का अर्थ उन पर पुन: सुनवाई आरंभ करना भी है। उसमें फैसला मुशर्रफ के विरुद्ध जा सकता है। वास्तव में न्यायाधीशों की बहाली शरीफ के समग्र मुशर्रफ विरोधी राजनीतिक एजेंडे का ही एक बिंदु है। निर्वासन के बाद पाकिस्तान की धरती पर कदम रखन के साथ ही उनका कहना था कि मुशर्रफ ने जा कुछ भी किया है, उसे वे लौटाकर पीछे अक्तूबर 1ी उस स्थिति में ले जाना चाहते हैं जब उन्होंने इनके खिलाफ विद्रोह करके सत्ता हथियायी थी। इसलिए उनकी तो दिली चाहत है कि पुनर्बहाल मुख्य न्यायाधीश मुकदम की सुनवाई कर मुशर्रफ की पात्रता को ही रद्द कर दें। इस हिसाब से न्यायाधीशों की पुनर्बहाली व्यापक राजनीतिक महत्व का प्रश्न है। पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के सह अध्यक्ष जरदारी राजनीतिक मसलों को पीछे छोड॥कर देश के लिए आवश्यक दूसरे काम की वकालत करते हैं। उनका एजेंडा शरीफ से भिन्न है। पीपीपी का शरीफ के मुशर्रफ विरोधी एजेंडे से बहुत कुछ लेना-देना वैसे भी नहीं हो सकता। स्वयं बेनजीर मुशर्रफ के साथ समझौता करके ही चुनाव मैदान में उतरीं थीं। दोनों पार्टियों के बीच गठबंधन ऐसा ही है जैसे भारत में कांग्रेस एवं भाजपा के बीच सत्ता की साझेदारी हो जाए। लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं

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