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राजरंग

ाहे लाठी खाये जा.. वीर तुम बढ़े जा। कमल ब्रांड वाले पूर जोश में हैं। दू दिन और भिड़ना है। कसम खाये हैं कि पीछे नहीं मुड़ना है। मुद्दा जो पकड़ाया है.. इहां से लेकर वहां (दिल्ली) तक हिलाना है। चोट तो चोट है। दर्द होता ही है। लेकिन लोगन के बीच जब अच्छा क्रेडिट मिले, तो दर्द भी कमने लगता है। अब ई जो इंडीपेंडेंटवन हैं इनको तो कुछ फर्क पड़ता नहीं। हवा पूरबा चले या पछिया। लाठी चले या गोली.. अपनी बत्ती तो लट्टू की तरह नाचती रहे भाई। कमल ब्रांड के निशाने पर तो हाथ है, लालटेन है और झारखंड के धनुषधारी हैं। असली लड़ाई तो यहीं पर है। अब ई नव रत्नों की सरकार बनाने-चलाने वाले अकबका गये हैं। किससे कहें.. क्या कहें। आपस में तालमेल है नहीं। अंदर से दुबले हुए जा रहे हैं, भगवा रंग वालों की स्पीड पता नहीं क्या गुल खिला दे। बोलती बंद है। हनी ब्रदर से भी पूछते नहीं बन रहा है कि ये क्या हो रहा है। बोलें भी किससे। कोई किसी की सुनने वाला नहीं।

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