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आईएएस की तर्ज पर हो शिक्षा सेवा

या केन्द्रीय विश्वविद्यालयों की चयन प्रक्रिया में व्यापक सुधार की जरूरत है। या फिर यहाँ की नियुक्ितयों में भी कुलपतियों की मनमानी, क्षेत्रवाद, भाई-भतीजावाद और जातिवाद सिर चढ॥कर बोलने लगा है। देश के तमाम नामी-गिरामी विश्वविद्यालयों की सेलेक्शन कमेटियों में बतौर एक्सपर्ट रह चुके प्रख्यात आलोचक प्रो. नामवर सिंह और राष्ट्रीय ललित कला अकादमी के चेयरमैन अशोक वाजपेयी का तो यही मानना है। इनका यह भी मानना है कि अब चूँकि देश में पर्याप्त संख्या में केन्द्रीय विश्वविद्यालय खुल चुके हैं तथा कई राज्यों में खुलने भी हैं, लिहाजा सरकार को भारतीय प्रशासनिक सेवाओं की तर्ज पर भारतीय विवि शिक्षा सेवा या भारतीय शिक्षण सेवा की शुरुआत कर देनी चाहिए वरना वह दिन दूर नहीं जब इन केन्द्रीय संस्थानों में योग्य शिक्षकों का टोटा हो जाएगा।ड्ढr बुधवार को हिन्दुस्तान से बातचीत में बात जब शिक्षा, शिक्षक और शिक्षार्थी पर चली तो दोनों लोग लगभग फट पड़े। नामवर सिंह यह कहने से नहीं चूके कि जरा पता करिए विश्वविद्यालयों में नियुक्ितयों के नाम पर हो क्या रहा है। किस तरह के लोग लेक्चरर, रीडर, प्रोफेसर या अन्य पदों पर नियुक्त हो रहे हैं तो आपकी आँखें खुली रह जाएँगी। अशोक वाजपेयी बोले, आज का विद्यार्थी बहुत अपडेट है। वह सब्जेक्ट पर पूरा कमांड चाहता है। अपने गुरुान से भी वैसी ही अपेक्षा रखता है पर बहुत से उच्च शिक्षा संस्थानों, शोध केन्द्रों व विश्वविद्यालयों की स्थितियाँ अब उलट हैं। संभवत: यही सोचकर यूजीसी को यह गाइडलाइन जारी करनी पड़ी कि अब छात्र भी अपने शिक्षकों की मॉनिटरिंग करंगे या उन्हें मार्क दे सकेंगे। यह दीगर है कि इसका मुखर विरोध हुआ पर यहाँ के अध्यापकों के लिए भी यदि रिफ्रेसर कोर्स चलाते हैं तो इसका मतलब यही है कि या तो वे अपने-आपको अपडेट नहीं रखते या फिर प्रोन्नति के लिए उनकी योग्यता संदिग्ध है। नामवर जी बोले, यहाँ तक तो गनीमत है पर विश्वविद्यालयों में अगर किसी कुलपति के चलते भाषावाद, प्रांतवाद, जातिवाद और क्षेत्रवाद चलने लगे तो स्थिति कितनी भयावह है, इसकी सहा में ही कल्पना की जा सकती है। बोले, इस सवाल पर अब बहस होनी चाहिए।

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