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बेचारे बीएसएनएल के मारे

भगवान उन लोगों को धर्य प्रदान कर, जिनके पास बीएसएनएल कनेक्शन है। खासतौर से मोबाइल कनेक्शन। वैसे मैं खुद भी पीड़ितों की जमात का मेंबर हूं और धर्य में राष्ट्रीय पुरस्कार पाने की योग्यता रखता हूं। हर महीने नियम से लैंडलाइन और मोबाइल का बिल अदा कर रहा हूं। इतना धन यदि दान कर देता तो शायद इनकम टैक्स में छूट मिल जाती। या, कुएं में डाल देता तो नेकी करने वाली कहावत ही चरितार्थ होती। लेकिन, किस्मत नाम की भी तो कोई चीज होती है, जो हर व्यक्ति के लिए अलग- अलग ढंग से लिखी जाती है। खर, इस धर्य अवधि के दौरान मैं निरंतर बीएसएनएल पर ही रिसर्च कर रहा हूं। रिसर्च के सिलसिले में मैंने बीएसएनएल का अर्थ जानने की भीष्म चेष्टा की। ये भीष्म चेष्टा वैसी ही होती है, जसी भीष्म प्रतिज्ञा। कुछ अर्थ प्रचलित भी हैं जसे- बीएसएनएल यानी ‘भाई साहब नहीं लगेगा।’ ये भी कहा जा सकता है कि ‘भाभी से नहीं लगेगा’ या ‘भगवान से नहीं लगेगा’ या ‘भारत संचार नकारा लिमिटेड’ या ‘भागो सरपट नहीं लगेगा’ वगैरह- वगैरह। नाम कुछ भी हो, गुण में फर्क नहीं पड़ता। मुसीबत को किसी भी ऐंगल से देखें, वह छोटी नहीं हो जाती, इसी तरह बीएसएनएल का फोन भी है। वह चालू हो या डेड, दोनों हालात में हाथी होता है। जिसे पालने वाला कुछ दिनों के बाद आत्महत्या करने की सोचने लगता है। मैं तो बीएसएनएल की महामारी से पीड़ित हूं। लगातार बिल रूपी दवा पर खर्च हो रहा है लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात।

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