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खबरिया चैनल का खतरनाक खेल

आमतौर पर मैं वह टीवी न्यूज चैनल नहीं देखती। पढ़ा था कि हिन्दी चैनलों में एक की टीआरपी अधिकतम तक पहुंच चुकी है। उस चैनल को देखना कितना जरूरी है यह अहसास 13 मई को जयपुर में हुए बम विस्फोट के दूसर दिन हुआ। ‘चेंजिंग चैनल सिन्ड्रोम’ से ग्रस्त मैं कैसे उस चैनल पर पहुंच गई, पता ही नहीं चला। स्क्रीन पर एक लिखा हुआ वाक्य उभरा और साथ में एक उत्तेजक वायस ओवर- ‘एक हादसा दो जज्बात’। ‘दो जज्बात’ को विशेष तौर पर बोलने और लिखने में हाईलाइट किया गया। देश की जनता से सवाल किया जा रहा था कि वह निर्णय लें कि ‘यह’ कहां तक सही है। फिर लिखकर और बोलकर ‘यह’ की व्याख्या की जा रही थी। बोले और लिखे गए शब्द पूर के पूर तो याद नहीं, पर वाचक बोल रहा था कि.. एक तरफ जयपुर में आंसू दूसरी तरफ कलकत्ता में जश्न! (वीडियो छवियों में जयपुर के बम धमाकों से प्रभावित लोगों के रोते-बिलखते दृश्यों के साथ कोलकाता ईडन गार्डन में सहवाग को आउट करने के बाद शोएब अख्तर का गोलाकार दौड़ते हुए अन्य खिलाड़ियों के गले लगने के दृश्य)। फिर वाचक बोल रहा था.. एक तरफ जयपुर में अपनों को खोने का दुख दूसरी तरफ कोलकाता में ‘किंग’ का विजय उत्सव (दृश्यों में शाहरुख खान का पैवेलियन में ताली बजाने का दृश्य)। आवाज ने फिर बताया कि जयपुर कराह रहा था और कलकत्ता नाच रहा था (दृश्यों में जयपुर में दुखी और रोते-बिलखते लोगों के दृश्यों और ईडन गार्डन में चियर लीडर्स के हाथों में चमकीले झाड़न थिरकने के दृश्य) वाचक की आवाज जश्न मनाने वालों में दो ही नामों को ले रही थी- शाहरुख और शोएब अख्तर के। एक के बाद एक तीन खिलाड़ियों को आउट करने वाले शोएब अख्तर के गले लगने वाले किसी भी अन्य खिलाड़ी का नाम वाचक को याद ही नहीं था। इस संदेश के खत्म होते ही चैनल का वाचक दर्शकों को ‘कामेडी की महफिल’ में ले जाता है। इस तरह चैनल वाले जयपुर में हुए हादसे के प्रति अपना दुख प्रकट करके दर्शकों को कामेडी की महफिल के भौंडे चुटकुलों में शामिल होने का निमंत्रण देकर शायद अपने दुख के साथ जनता का दुख भी कम करने की कोशिश कर रहे थे। और कामेडी सरकस को किसी प्रकार का जश्न नहीं मानते थे। जयपुर में बम धमाकों वाले दिन मैंने टीवी नहीं देखा था.. पर यदि उनके ‘फिक्स्ड प्वाइन्ट चार्ट’ में उस दिन भी ‘कामेडी की महफिल’ रही होगी तो मेरा अनुमान है कि महफिल की रंगत दिखाई गई होगी। शाहरुख खान और शोएब अख्तर पर टिप्पणी करते हुए वाचक ने तोहमत लगाते हुए चिल्लाकर पूछा था कि ‘क्या जयपुर की खबर इन तक नहीं पहुंची होगी?’ और एक आदर्श संभव स्थिति का सुझाव देते हुए वाचक ने कहा, ‘हम नहीं कहते कि खेल नहीं होना चाहिए था पर जश्न तो नहीं होना चाहिए था।’ड्ढr इस सुझाव पर चैनल और वाचक के साथ मेरी पूरी सहमति है। पर आरोपों के कटघर में लाने के लिए चैनल को ग्यारह लोगों की टीम में से दो ही नाम क्यों याद आ रहे थे?ड्ढr यह चैनल क्रिकेट पर एक विशेषज्ञ से चर्चा करता है और उससे पूछता है कि ‘कल के मैच में आपको मजा आया?’ विशेषज्ञ बताते हैं कि उन्हें ‘बहुत मजा आया’। जयपुर के हादसे के दिन एक विशेषज्ञ का उसी क्रिकेट मैच को देखकर, जिससे जुड़े दो व्यक्ित को चैनल नैतिक अपराधियों की श्रेणी में दिखा रहा था, कहना कि ‘बहुत मजा आया’ क्या शब्दों की अभिव्यक्ित का जश्न नहीं था?ड्ढr चैनल अपनी संतुलित छवि के प्रदर्शन के लिए साम्प्रदायिक एकता के प्रतीक के रूप में सर्वधर्म श्रद्धांजलि सभा करके आमंत्रित धर्म गुरुओं की वाहवाही लूटता है, पर इस श्रद्धांजलि सभा के बीच-बीच में वह तीन बार लम्बे कमर्शियल ब्रेक जरूर लेता है। इस तरह वह श्रद्धांजलि सभा से भी पैसा कमाना नहीं भूलता।ड्ढr कुल मिलाकर यह चैनल अपने एजेन्डे के तहत ‘बिटवीन द लाइन्स’ जो कहना चाहता है, कहता है। पर वह भी बाजार का गुलाम है इसलिए श्रद्धांजलि सभा से भी वह पैसा कमाता है। शाहरुख और शोएब अख्तर भी बाजार के गुलाम हैं।ड्ढr एक ने क्रिकेट के बाजार में पैसा लगाया है और दूसर बिके हुए खिलाड़ी को अपनी कीमत अदा करनी है। बाजार सबकी संवेदनशीलता भोंथरी कर देता है। वह चाहे शाहरुख खान हो या चैनल, पर परदे की आड़ में साम्प्रदायिकता का खेल खेलने वाले शरारती तत्वों से सावधान रहना जरूरी है।ड्ढr

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