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ऐसे कैसे हो सकेगी आतंकियों की जासूसी

आतंकियों के लिए पाकिस्तान, बंग्लादेश और कश्मीर तक में स्पेशल ट्रेनिंग कैम्प चल रहे हैं और यहाँ उनका पता करने वाले इंटेलिजेंस कर्मियों के लिए ट्रेनिंग का कोई कार्यक्रम ही नहीं है। जयपुर-लखनऊ से लेकर दिल्ली-बंगलुरु तक के धमाकों में टेररिस्ट आरडीएक्स, लैपटॉप, इंटरनेट और साइबर कैफे का इस्तेमाल कर रहे हैं जबकि उनकी टोह लेने वाली लोकल इंटेलिजेंस यूनिट के सिपाही-दरोगा के पास सरकारी मोबाइल फोन तक नहीं है। आतंकी अपने लक्ष्य को पूरा करने के लिए जेहादी जुनून में डूबकर काम करते हैं और अपने इंटेलिजेंस वाले .पनिश्मेंट पोस्टिंग.की कुंठा में जासूसी के काम को बेगार समझकर करते हैं।ड्ढr यह हाल है उत्तर प्रदेश के अभिसूचना तंत्र का। इस संवाददाता ने लखनऊ समेत यूपी के विभिन्न जिलों में काम कर रही एलआईयू की कार्यप्रणाली, संसाधनों और जरूरतों के बार में जानकारी हासिल की। इस सिलसिले में महकमे के बड़े अधिकारियों से लेकर इंस्पेक्टर व सिपाहियों तक से बातचीत की गई। इससे एक बात स्पष्ट हुई कि अब खुफिया तंत्र के ढाँचे में बड़े बदलाव की जरूरत है। मसलन इसे आईबी की तर्ज पर लाना चाहिए।ड्ढr सबसे बड़ी दिक्कत लीडरशिप को लेकर है। अभी इंटेलिजेंस को पुलिस अफसरों का काला पानी माना जाता है। ऐसे अधिकारी यहाँ भेजे जाते हैं जिनसे सरकार नाखुश होती है। इस वजह से यहाँ कुछ महीनों में ही अधिकारी बदल जाते हैं। नीचे की स्थिति तो वाकई बहुत खराब है। ‘कवाल’ शहरों को छोड़ बाकी जिलों में एक इंस्पेक्टर पूर जिले की अभिसूचनाएँ इकट्ठी करता है। एक जिले के एलआईयू इंस्पेक्टर ने बताया-.हमारी ही रैंक का थानेदार जीप पर इलाके का राउंड करता है और उसे मोबाइल समेत कई सुविधाएँ मिली हुई हैं। हम लोगों से अपनी मोटरसाइकिल से ही पूर शहर की सूचनाएँ इकट्ठी करने की अपेक्षा की जाती है..यह कैसे संभव है। सिपाही-दरोगा की हालत तो और भी खराब है। उन्हें सूचनाएँ लाने के लिए अगर बार-बार कहीं जाना पड़ता है तो उसका यात्रा व्यय तक उन्हें नहीं मिलता।ड्ढr एक जिले के एसएसपी ने कहा-इंटेलिजेंस के काम में ऐसे लोग लिए जाने चाहिए जो अपनी इच्छा से आएँ..जसा आईबी में होता है। इसका विशेष कैडर भी बनाया जा सकता है। यह एक खास तरह का काम है जो हर कोई नहीं कर सकता। एक इंस्पेक्टर के मुताबिक ऊपर के लोगों की अपेक्षा राजनीतिक धरना-प्रदर्शनों व जानकारियों को लेकर ज्यादा होती है..ऐसे में आतंकवाद से जुड़ी जानकारियों को जुटाने के काम की वाकई में काफी अनदेखी की जा रही है।

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