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साइकिल की खबरों में वापसी-ससन्देह

रीब पन्द्रह-सोलह वर्ष पुरानी बात है। रामलोटन रोते हुए हमार पास आए थे। उनकी साइकिल चोरी हो गई थी। हमसे पुराना परिचय था। सो, चाहते थे कि साइकिल चोरी की खबर छप जाए, पुलिस कुछ कर ताकि उनकी जरूरी सवारी वापस मिल जाए। ‘साइकिल चोरी की खबर!?’- क्राइम रिपोर्टर ने हैरत से कहा था- ‘इसकी तो अब एफआईआर भी नहीं होती।’ बात सही थी। साइकिल चोरी की रिपोर्ट और खबर लिखना कबके बन्द हो चुका था। बढ़ती कारों के जमाने में साइकिल कोई खबर लायक सवारी नहीं रह गई थी। हमार बचपन में साइकिल का लाइसेंस बनवाना पड़ता था। नगर महापालिका के दफ्तर में इसके लिए चप्पल घिसनी पड़ती थी। 1तक हमने साइकिल का लाइसेंस बनवाया था। पीतल का छेदवाला टोकन या तो साइकिल में किसी नट से कस दिया जाता या चाबी के छल्ले में शान से टनटनाता था। उन दिनों साइकिलें खूब चोरी होती थीं और पुलिस बाकायदा एफआईआर लिखती थी। यानी साइकिल की भी गिनती थी। फिर पता नहीं कब साइकिल खबरों से गायब होने लगी। स्कूटरों-मोटर साइकिलों की बढ़ती भीड़ और मारुतियों की चकाचौंध में साइकिल बेचारी हो गई। उनका चोरी होना जारी था मगर लाइसेंस बनना, एफआईआर लिखना और खबर छपना बन्द हो गया था। बेचारा रामलोटन! हमने उसका मन रखने के लिए अखबार के एक कोने में चार लाइन की खबर छाप दी थी।ड्ढr खैर, खबरों से बाहर होने के बावजूद साइकिल जीवन से बाहर नहीं हुई और वह गाँवों से लेकर शहरों तक बहुत बड़ी आबादी की महत्वपूर्ण सवारी बनी रही। साइकिल पर दुल्हन की विदाई भी होती रही और माँ-बप्पा इलाज के लिए अस्पताल भी ले जाए जाते रहे। खेतों के बीच पगडंडियों पर वह घास-लकड़ी-राशन-पानी ढोने से लेकर आगे डण्डे पर बँधी नन्हीं गद्दी पर बच्चों की किलकारियाँ भी सुनाती रही। दूध के भारी कैन लादने हों तो दो डण्डों वाली मजबूत साइकिल हाजिर। शहरों में स्कूली बच्चों के नाज-नखर उठाने को साइकिल ट्रण्डी और फैन्शी बनी और महँगी भी। आईआईटी-आईआईएम जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों के विशाल परिसरों में नामी प्रोफेसर भी घुटन्ना पहनकर मजे से साइकिल चलाते रहे। वह इतनी सहज सवारी है कि जब उस पर सवार न होना हो तब भी एक हाथ से हैण्डिल थामे-थामे वह मजे में बगल-बगल चला करती है। उसे जब चाहो बस की छत पर चढ़ा लो या ट्रन में या कार की डिक्की में या फिर दोनों हाथों में उठा लो, अगर कोई दीवार या बाधा पार करनी हो। बड़े-बड़े घरों में आलीशान कारों के बीच भी एक अदद साइकिल अकड़ के साथ खड़ी रहती है- ‘ईदगाह’ वाले हामिद के चिमटे जैसी शान से!ड्ढr बहरहाल, भोले-भाले भारतीयों की भोली साइकिल इधर खबरों में है और वजह कतई अच्छी नहीं। साइकिल सन्देह के घेर में है और संकट में। आतंकवादियों ने कई शहरों में जानलेवा धमाके करने के लिए साइकिलों का इस्तेमाल किया। साइकिलें खरीदीं, उनमें विस्फोटक रखा और भीड़-भाड़ वाली जगहों पर खड़ी कर दी। कितना आसान। साइकिल वालों पर कैसा शक। वे तो निरीह, गरीब और रोजी-रोटी की जुगत में मशगूल लोग होते हैं। तो, शक सुबहे से बचने के लिए ही आतंकवादियों ने साइकिलों को धमाकों का माध्यम बनाया। लेकिन क्या इसी वजह से इस देश के आम जन की सवारी अब शक के दायर में ला दी जाएगी? कुछ संवेदनशील जिलों से खबरं आ रही हैं कि साइकिल दुकानदारों से कहा गया है कि वे खरीदारों का लेखा-जोखा रखें। उनसे पहचान-पत्र माँगें, आदि-आदि। उद्देश्य नेक है कि ऐसे किसी हादसे के बाद इस पहचान-पत्र के जरिए आतंकवादियों तक पहँुचने के कुछ सूत्र हाथ लग सकें। लेकिन आतंकी इतने भोले नहीं कि वे साइकिल खरीदने के लिए सही पहचान दे देंगे, लेकिन इन निर्देशों से आम भारतीय के लिए साइकिल खरीद पाना टेढ़ी खीर जरूर बन सकता है। बदनीयती से साइकिल खरीदने वाला फर्जी पहचान पत्र बनवा लेगा लेकिन सीधा-साधा ग्रामीण ‘आईडी-प्रूफ’ के चक्कर में दौड़ता रह जाएगा। और तब क्या होगा जब किसी मजदूर की साइकिल के कैरियर में बँधी आधा किलो आटे की पोटली को आरडीएक्स के सन्देह में पकड़ा-जाँचा जाएगा? साइकिल वालोंड्ढr पर सन्देह का अर्थ होगा इस देशड्ढr की सबसे सरल सामान्य औरड्ढr बड़ी आबादी को शक के दायरड्ढr में लाना।ड्ढr आतंकवादियों की नापाक हरकतों से बचने और उनकी पकड़-धकड़ के लिए सोच-समझकर कुछ और बेहतर कदम उठाए जाएँ और साइकिल पर रहम किया जाए।

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