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समस्या का आरक्षण

राजस्थान में गुर्जर जाति के आरक्षण को लेकर फैली हिंसा की आग उन सभी राजनीतिक दलों के लिए फिर एक खतरनाक चेतावनी है, जो अपने संकीर्ण स्वार्थो की खातिर राजनीतिक रोटियां सेकने से बाज नहीं आते। ताजा हिंसा यह भी रखांकित करती है कि आरक्षण के जिन्न को एक बार शह देने के बाद वह किस प्रकार भस्मासुर बन जाता है। अकारण मोल ली गई इस समस्या के गंभीर बनने का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि भरतपुर और दौसा के मात्र कुछ इलाकों में भड़की हिंसा को पुलिस रोक नहीं पाई और सेना तथा सीआरपीएफ को बुलाना पड़ा। ओबीसी कोटे में पहले से शामिल होने के कारण राजस्थान में गुर्जरों को आरक्षण प्राप्त था, पर पिछले विधानसभा चुनाव में राज्य के सत्ताधारी भाजपा नेताओं ने उन्हें एसटी (अनुसूचित जनजाति) में लाने के प्रयास का वायदा किया था। गुर्जरों को लगा कि वे एसटी में शामिल होकर अधिक नौकरियां पा सकेंगे। इस आड़ में जो नेता वोट बैंक की राजनीति का खेल खेल रहे थे, अब यह उन्हीं की सरकार की भारी मुसीबत का सबब बन गया है। दुर्भाग्य यह है कि विगत के इससे मिलते-ाुलते उदाहरणों के बावजूद राजनीतिक दल और उनके नेता अपने संकीर्ण स्वार्थो से ऊपर उठकर व्यापक राष्ट्र-हित में नहीं सोचते। इस तरह की मांग को हवा देने से गुर्जरों की आबादी वाले अन्य राज्यों- उत्तर प्रदेश, हरियाणा और दिल्ली में भी आंदोलन भड़क सकता है। संविधान में आरक्षण के प्रावधान के पीछे मकसद पिछड़े लोगों का उत्थान करना था, पर चुनावी जीत सुनिश्चित बनाने के लिए इसका इस्तेमाल किया जाने लगा। दुष्परिणामस्वरूप जातियों के बीच बैर-वैमनस्य फैला है। राजस्थान में मीणाओं व गुर्जरों के बीच टकरावपूर्ण स्थिति इसकी स्पष्ट सूचक है। कई जातियां अपनी हालत में सुधार के लिए शॉर्ट कट के रूप में आरक्षण की मांग करते हुए हर उचित-अनुचित तरीके अपनाने पर आमादा हैं। बेहतर होगा कि समस्या के बवंडर बनने से पहले ही उसके हल के प्रयास किए जाएं, वर्ना आरक्षण का मूल मकसद खत्म हो जाएगा और देश के सामाजिक ताने-बाने को नुकसान पहुंचेगा, सो अलग।ं

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