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कैदी डॉक्टर और सत्ता का मर्ज

विश्व स्वास्थ्य और मानवाधिकार के लिए 2008 के जोनाथन मैन पुरस्कार से नवाजे गए डॉ. बिनायक सेन इसे पाने वाले पहले दक्षिण एशियाई हैं, लेकिन फिलहाल वे छत्तीसगढ़ की जेल में बतौर नक्सलवादी कैद भुगत रहे हैं। 22 नोबल पुरस्कार विजेताओं ने भारत के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री से मांग की है कि डॉ. बिनायक सेन को तत्काल रिहा कर दिया जाए, जिससे कि वे पुरस्कार वितरण समारोह में पहुंच सकें। डॉ. बिनायक से मेरी पहली मुलाकात आठवें दशक के मध्य में हुई थी, जबकि मैं वहां शंकरगुहा नियोगी के नेतृत्व वाले छत्तीसगढ़ मुक्ितमोर्चा के लिए डॉक्युमेंटरी प्रदर्शित करने गया था। नियोगी के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ मुक्ितमोर्चा ने हाारों शोषित आदिवासी खान कामगारों के लिए आशा की उम्मीदें जगाई थीं। बिनायक और दो अन्य डॉक्टरों ने अपनी सेवाएं यूनियन को दी थीं। उन्होंने कामगारों के श्रमदान से एक छोटा-सा, लेकिन निराले ढंग से 15 बिस्तरों वाला सक्षम अस्पताल स्थापित किया था। यह अस्पताल न्याय के साथ विकास के बड़े सपने का एक अंग था, लेकिन यह सपना उस समय टूट गया जबकि 1में निहित स्वार्थो ने अपनी झोपड़ी में सोए नियोगी की गोली मार कर हत्या कर दी। उनके भाड़े के हत्यारों को कुछ समय के लिए गिरफ्तार किया गया था, लेकिन जिन लोगों के शातिर दिमाग ने इस हत्या की योजना बनाई थी, वे लोग सजा से बच गए। नियोगी की मृत्यु के बाद जनकलाल ठाकुर और कार्यकर्ताओं के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ मुक्ित मोर्चा ने दिलेरी से संघर्ष किया, लेकिन समय बदल रहा था। इसी शून्य में नक्सलवादी सशस्त्र संघर्ष विकसित हुआ। बहुत से आदिवासियों ने इसमें अपने जवाबी प्रतिरोध का अवसर देखा। सरकार ने इसका प्रतिवाद सलवा जुड़ूम से दिया। सलवा जुड़ूम निजी वित्तपोषित चौकस सेना थी। इसमें आदिवासियों से लड़ने के लिए आदिवासियों को भर्ती, हथियारबंद और प्रशिक्षित किया गया। हत्या, जवाबी हत्या और फर्ाी मुठोड़ों का एक अवैध सीमांत निर्मित किया गया। इसकी मार आदिवासियों को झेलनी पड़ी थी। ये आदिवासी पहले से ही विस्थापित और वंचित थे। अब वे सभी तरफ से मार जाने के लिए मजबूर थे।ड्ढr जहां अधिकांश डॉक्टर पैर रखने से भी डरते थे, वहां बिनायक ने डॉक्टर होने की अतिरिक्त डय़ूटी अपने ऊपर ओढ़ ली। स्वास्थ्य और मानवाधिकार के बीच सम्बंध की शिनाख्त करते हुए वे पीपुल्स यूनियन ऑफ सिविल लिबर्टीज में शामिल हुए और उसके क्षेत्रीय महासचिव और राष्ट्रीय उपाध्यक्षों में से एक बने। पीयूसीएल के सचिव के तौर पर बिनायक ने नक्सलवादी हिंसा की निंदा की, लेकिन राज्य सत्ता उनसे उस समय नाराज हो गई जब उन्होंने उसके सलवा जुड़ूम से सम्बंधों का दस्तावेजीकरण किया और पुलिस मुठोड़ों का भंडाफोड़ किया। मेडिकल और सिविल लिबर्टीज के कार्यो के सिलसिले में बिनायक और उनकी टीम ने नक्सलवादी अभियुक्तों से जेल में मुलाकात की। इन कैदियों में एक बीमार बुजुर्ग व्यक्ित भी था। बिनायक उसे कई बार देखने गए और उसकी सर्जरी की व्यवस्था की। बिनायक के बार-बार जेल में मुलाकात के लिए जाने को बाद में इस बात के प्रमाण के तौर पर पेश किया कि इन दोनों के बीच विशेष सम्बंध था। बिनायक पर गुप्त तरीके से एक पत्र स्मगल करने का आरोप भी लगाया गया यद्यपि सभी मुलाकातों के दौरान उनकी तलाशी ली गई थी और उस समय कोई आपत्ति नहीं उठाई गई थ। जब बिनायक ने सलवा जुड़ूम और आदिवासियों के हत्याओं की खुलेआम निंदा की, उसके बाद ही पुलिस ने उसके खिलाफ आरोप लगाए और उसे छत्तीसगढ़ विशेष सार्वजनिक सुरक्षा कानून के तहत गिरफ्तार किया। इस कानून के तहत किसी भी व्यक्ित को बिना जमानत और उसके खिलाफ कोई साक्ष्य पेश किए बिना अनिश्चित काल तक नजरबंद किया जा सकता है। जब बिनायक की नजरबंदी के खिलाफ सुप्रीमकोर्ट में दस्तक दी गई तो मामले की सुनवाई में देरी की गई और बाद में एक भी कारण बताए बिना उन्हें जमानत नहीं दी गई। इससे प्रोत्साहित होकर छत्तीसगढ़ जेलर और एक कदम आगे गए उन्होंने बिनायक को मानवाधिकार संहिताओं का उल्लंघन करते हुए एकांत कारावास में डाल दिया।ड्ढr बिनायक का वजन 20 किलोग्राम घट गया है, वह भी 58 साल की उम्र में। कड़े विरोध के कारण उनका एकांत कारावास तो खत्म कर दिया गया है। उन्हें मिले पुरस्कारों में गरीबों की उत्कृष्ट सेवा के लिए पॉल हैरिसन पुरस्कार और इंडियन अकेडमी ऑफ सोशल साइंस का कीथन गोल्ड मेडल शामिल है। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने जिनमें कि एमनेस्टी इंटरनेशनल शामिल है, उनके बिना शर्त रिहाई की मांग की है।ड्ढr क्या डॉ. बिनायक के उत्पीड़न को मौजूदा राज्य सरकार की प्रतिशोधी राजनीति के तौर पर देखा जाना चाहिए, दुर्भाग्य से ऐसा नहीं है। ऐसा लगता है कि इसके लिए केन्द्र से मंजूरी मिली हुई है। इसमें विशिष्ट शासक वर्ग है, जिसमें मुख्यधारा की मीडिया भी शामिल है, जो वंचित वर्ग की हिमायत करने वाले सभी लोगों को क्रांतिकारी और नक्सलवादी बता देता है। पिछले साल मैंने एक लेख में लिखा था कि यदि राज्य की आलोचना करने के लिए बिनायक को नक्सलवादी कहा जा सकता है तो मुझे भी नक्सलवादी कहा जा सकता है। हाल ही में महाराष्ट्र के उप मुख्यमंत्री आर. आर. पाटील ने कहा था कि यदि मेधा पाटकर और भारत पाटणकर को नक्सलवादी कहा जा रहा है तो वे भी नक्सलवादी हैं। यह अलग बात है कि आर. आर. पाटील ने खरलांजी में बलात्कार और नरसंहार का विरोध करने वाले दलितों के लिए नक्सलवादी शब्द का इस्तेमाल किया था।ड्ढr हम एक ऐसी प्रणाली में रहते हैं जो कि विरोध के सभी आंदोलनों को या तो कुचल देती है या उसे सहयोजित कर लेती है। नक्सलवादी शब्द किसी भी तरह के समझौता न करने वाले विरोध का पर्यायवाची बन गया है। कोई हिंसा में विश्वास करता है या हिंसा भड़काता है, इस आरोप को प्रमाणित करने की जरूरत नहीं रहती। भ्रष्ट प्रणाली में यह पर्याप्त है कि जो व्यक्ित खरीदा नहीं जा सकता, उसे एक घातक खतर के तौर पर चिह्न्ति कर दिया जाए।ड्ढr बिनायक नक्सलवादी नहीं है, लेकिन नक्सलवाद बढ़ता जा रहा है ऐसा क्यों हो रहा है? क्या यह चीन का सांस्कृतिक हमला है? क्या आज के युवा चेयरमैन माओ की सेक्सी तस्वीरों से बहक रहे हैं? तथ्य यह है कि हमार विकास का स्वरूप बड़े पैमाने पर गरीबी और अन्याय को उपजाता है। अहिंसक आंदोलनों में असफलता के बाद लोगों के सामने दूसरा कोई रास्ता नहीं बचा है। चिकित्सा का पेशा जिस तरह निजीकरण और मुनाफे के रास्ते पर जा रहा है, उसे भी किडनी प्रत्यारोपण सम्राट डॉ. कुमार और छत्तीसगढ़ के अच्छे डॉक्टर बिनायक सेन में से किसी एक का चुनाव करना पड़ेगा।ड्ढr ं

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