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सशस्त बल न्यायाधिकचचरण कचची नियम फचचाइल कचचानून मंत्रालय ने लौटाई

सशस्त्र बलों को अपनी व्यवस्था के भीतर अपीली मंच के तौर पर न्यायाधिकरण का गठन करने वाले क्रांतिकारी कानून पर अमल के मकसद से तैयार की गई नियम निर्धारण संबंधी फाइल कानून मंत्रालय ने बैरंग लौटा दी है। रक्षा सूत्रों के अनुसार कानून मंत्रालय ने यह कहते हुए फाइल वापस की है कि पहले इन नियमों को प्रस्तावित न्यायाधिकरण के अध्यक्ष को देख लेना चाहिए जिनकी नियुक्ित अभी होनी बाकी है। इस नियुक्ित में देरी के कारण सशस्त्र बल न्यायाधिकरण का गठन जल्दी होते दिखाई नहीं दे रहा है। रक्षा मंत्रालय की स्क्रीनिंग कमेटी को अध्यक्ष के नाम की सिफारिश करनी है और यह नाम देश के मुख्य न्यायाधीश के पास से होते हुए राष्ट्रपति के पास जाएगा।ड्ढr ड्ढr न्यायाधिकरण की प्रधान पीठ दिल्ली के आरके पुरम के पश्चिमी प्रखंड में कायम की जानी है। प्रधान पीठ का गठन होने से पहले दिल्ली उच्च न्यायालय में सशस्त्र बलों संबंधी करीब चार हजार मामलों की सुनवाई धीमी पड़ गई है जिन्हें न्यायाधिकरण के पास भेजा जाना है। इसके अलावा देशभर में आठ हजार अन्य मामले विभिन्न उच्च न्यायालयों में लम्बित हैं जिन्हें आठ शहरों में स्थापित की जाने वाली क्षेत्रीय पीठों के समक्ष स्थानांतरित किया जाएगा। ये पीठें चंडीगढ़, लखनऊ, जयपुर, मुम्बई, कोलकाता, गुवाहाटी, चेन्नई और कोच्चि में स्थापित की जाएंगी। इन पीठों के प्रशासनिक सदस्यों की नियुक्ित को लेकर भी तीनों सशस्त्र सेनाओं में रस्साकशी की स्थिति है। इसके सदस्य मेजर जनरल और उनके समकक्ष रैंक के तीन साल का अनुभव प्राप्त अधिकारी बन सकते हैं या तीनों बलों के जज एडवोकेट जनरलों को इनका सदस्य बनाया जा सकता है।ड्ढr ड्ढr न्यायाधिकरण के अध्यक्ष की सेवानिवृत्ति की उम्र 70 वर्ष और न्यायिक सदस्यों की सेवानिवृत्ति की आयु 65 वर्ष रखी गई है जो आकर्षण का बड़ा कारण बन गई है। तीनों सशस्त्र सेनाएं चाहती हैं कि प्रशासनिक सदस्यों के लिए हर बल का कोटा होना चाहिए। जाहिर तौर पर सेना इसमें अधिक कोटा चाहती है क्योंकि ज्यादा मामले थल सेना के लम्बित हैं। सशस्त्र बल न्यायाधिकरण का गठन देश की फौज के न्यायविधान में क्रांति करने वाला कदम माना जा रहा है जिसमें कोर्ट मार्शल की प्रक्रिया को भी चुनौती दी जा सकेगी। लेकिन कोर्ट मार्शल में मामला हारने पर सरकार को भी न्यायाधिकरण में जाने का हक दिया गया है। इसके अलावा पूर्व सैनिक भी अपने मामलों के निराकरण के लिए न्यायाधिकरण की शरण में जा सकते हैं।

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