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अंधेपन का दूसरा बड़ा कारण ग्लूकोमा

किसी व्यक्ित को आंख में दबाव और पढ़नेवाले चश्मे को बदलने की जरूरत महसूस हो तो शीघ्र नेत्र रोग विशेषज्ञ से जांच कराने की आवश्यकता है। इस प्रकार की शिकायत ग्लूकोमा की बीमारी हो सकती है। यह विचार देश के प्रसिद्ध नेत्र रोग विशेषज्ञों ने बिहार ऑप्थेलमोलॉजिकल सोसायटी द्वारा ग्लूकोमा पर आयोजित सम्मेलन में कही।ड्ढr ड्ढr ए.एन.सिन्हा शोध संस्थान में रविवार को आयोजित सम्मेलन में हिन्दुजा हॉस्पीटल,मुम्बई के डा.बरुण के.नायक ने बताया कि अंधापन का दूसरा सबसे बड़ा कारण ग्लूकोमा की बीमारी है। इसमें आंख की रोशनी नहीं लौटती। उन्होंने कहा कि 40 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों को आंख के दबाव की नियमित जांच करानी चाहिए। एक बार जब ग्लूकोमा की पहचान हो जाए तो मरीज को भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है। सम्मेलन को संबोधित करते हुए एलवी प्रसाद आई इंस्टीच्युट के निदेशक डा.जी.चन्द्रशेखर ने बताया है कि भारत में ग्लूृकोमा के मरीजों की प्रारंभिक अवस्था में पहचान सिर्फ 2-4.7 फीसदी लोगों में होती है। यह गंभीर स्थिति है कि देश के 0 फीसदी लोगों को इसके बार में कोई जानकारी नहीं है।ड्ढr ड्ढr कोलकाता के डा.मैत्रयी दास ने ग्लूकोमा के इलाज में लेजर और आर्गन लेजर तकनीक के लाभ की जानकारी दी। इस मौके पर सम्मेलन के संयोजक डा.सुनील कुमार सिंह ने बताया कि ग्लूकोमा का कोई लक्षण नहीं होता। यह दर्द और तकलीफ भी नहीं देता। मधुमेह रोगियों को आंख की नियमित अंतराल पर जांच करानी चाहिए। डा.ए.एन.पाण्डेय ने सम्मेलन का उद्घाटन जबकि सोसायटी के सचिव डा.सुभाष प्रसाद ने सत्र की अध्यक्षता की।

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