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10 अप्रैल, 2020|5:52|IST

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आज बिजली को तरस रहे कल अनाज के लिए तरसेंगे

आज से 40 साल पहले शहर के विकास की योजना बनाने वालों ने सोचा भी नहीं कि आगे क्या होगा। नतीजा 40 साल बाद यहां पानी, बिजली जैसी मूलभूत सुविधाओं के लिए पूरा शहर तरस रहा है। इस स्थिति के बावजूद भी हम सुधरने की बजाए जल्दबाजी कर रहे हैं। शहर में जगह-जगह मकान तोड़ कर मल्टीस्टोरी भवन बन रहे हैं। लखनऊ विकास प्राधिकरण को सोचना चाहिए कि जहां एक परिवार रहता था वहां मल्टीस्टोरी बन जाने के बाद 100 रहेंगे।

ऐसे में क्या जमीन इतना दबाव सह सकेगी? क्या इन परिवारों को देने के लिए बिजली और पानी की व्यवस्था हो पाएगी? यही सवाल तब भी उठा था जब शहर में इतने मल्टीस्टोरी भवन नहीं थे। अब आधा शहर इनसे पट चुका है तब भी इस सवाल का हल ढूंढ़ने की बजाए हम और इमारतें खड़ी करते जा रहे हैं। किसी भी शहर का विकास कैसा और कैसे किया जाएगा इसके लिए अन्तरराष्ट्रीय मानक हैं। इनकी लगातार अनदेखी की जा रही है।

शहर को विकसित करने के लिए सैटेलाइट टाउनशिप की जरूरत है। यानी मूल शहर के चारों तरफ 20-25 किलोमीटर की हरियाली छोड़ कर छोटे-छोटे शहर बनाएं और परवहिन मार्ग से उनको जोड़ें। इसका कोई पालन नहीं हो रहा। अब बाराबंकी तक लखनऊ को जोड़ा जाएगा। यानी खेती की जमीन बचेगी नहीं और आज बिजली के लिए तरस रहा सूबा कल अनाज के लिए तरसेगा। बागों का शहर अब पत्थरों का बन गयाआज से 150 साल पहले का लखनऊ बागों के लिए मशहूर था।

विकास के नाम पर लगातार पेड़ काटे गए। ज्यादा पुराना समय भूल जाइए, पिछले दो दशकों में सड़क चौड़ी करने के नाम पर लाखों पेड़ काट दिए गए। उनकी जगह जो पेड़ लगाए गए वो कागजों तक सीमित रह गए। नतीजा यह है कि यह शहर अब पत्थरों का बन चुका है। अजी छोडिम्ए.. ईकोफ्रेंडली तो दूर हम खुद के दुश्मन बन गएईकोफ्रेंडली का अर्थ है कि हम अपने आसपास के पर्यावरण को सुरक्षित बनाएं। अपनी मनुष्य प्रजाति के अलावा अन्य जीव जंतुओं का भी खयाल रखें, ये धरती सिर्फ हमारी नहीं है।

उनका हक इस पर हमसे ज्यादा है क्योंकि इनसान से पहले अन्य जीव जंतु उत्पन्न हुए। इस लहिाज से हम जरा भी ईकोफ्रेंडली नहीं हैं। पेड़ खत्म कर चिडिम्यों के बसेरे छीन लिए। बाग और जंगल खत्म कर दिए तो अन्य जीवों के लिए जगह नहीं बची। यहां तक कि हम खुद इनसानों के दुश्मन बनते जा रहे हैं। जरा सोचिए.. गोमती नगर जैसी कालोनी विकसित की गई तो कॉमर्शियल जमीन अलग से छोड़ी गई यह अच्छी सोच थी। बाद में सड़क किनारे की कालोनियों को कॉमर्शियल भूमि घोषित कर दिया गया।

इसकी वजह से अब जगह-जगह कॉमर्शियल भवन बन गए और वाहन सड़क पर खड़े होते हैं। वहां रहने वाले कई लोग अपने घर से निकलते ही जाम में फंस जाते हैं। जितनी तेजी से हरियाली खत्म हो रही है वाहनों की संख्या उससे कहीं अधिक तेजी से बढ़ रही है। कोई टाउन प्लानर कभी यह सोचता है कि आने वाली पीढ़ी को विरासत में हम कितना जहरीला वातावरण देने जा रहे हैं।

छोटे-छोटे उपाय अपना कर बच सकते हैं विनाश सेस्कूल ऑफ मैनेजमेंट साइंसेज के निदेशक डॉ. भारत सिंह ने काफी पहले ही अपनी पुस्तक ‘क्लाइमेट चेंज ऑर ग्लोबल वार्मिग’ में आगाह किया था कि प्रकृति से खिलवाड़ ठीक नहीं। यदि जल्द ही कोई कदम नहीं उठाया गया तो आने वाले समय में प्राकृतिक आपदाओं से जूझना होगा। उन्होंने पुस्तक में लिखा था कि पृथ्वी का तापमान बढ़ने से न्यूयॉर्क शहर तूफानों से अगले दशक में डूब जाएगा और ऐसा ही हुआ भी।

डॉ. सिंह का सुझाव है कि छोटे-छोटे उपाय अपना कर पर्यावरण में परविर्तन को रोका जा सकता है। विशेष रूप से बिजली में बचत के लिए सीएफएल या एलईडी का उपयोग कर सकते हैं। इसी तरह रिसाइकिलिंग कर वस्तुओं का दोबारा उपयोग, अकेले जाने वाले लोग अपनी कार ले जाने की बजाए बारी-बारी से अपने क्षेत्र में रहने वाले सहयोगी से मिलजुल कर कार से जाएं तो बहुत असर पड़ेगा। इनसे लें सबक-पौधा बिटिया है मरघट तक साथ निभाएगीसेंट्रल स्कूल में अध्यापक रहे चन्द्रभूषण तिवारी ने पर्यावरण के लिए नौकरी छोड़ दी।

अब तक वह जगह-जगह 86 हजार से अधिक नीम, पीपल, पकरिया, बेल, गूलर आदि के लगा चुके हैं। कहते हैं कि पौधे उनकी बेटियां हैं। जैसे एक पिता अपनी बेटी के लिए योग्य घर और वर ढूंढ़ता है वैसे ही वह भी ढूंढ़ते हैं। जिसको भी पौधा देते हैं उससे कहते हैं कि मेरी बेटी बहुत नाजुक है, लाड़-प्यार से पली है। जानवरों से बचाइएगा यह डरती है। इसे प्यास बहुत लगती है इसलिए पानी जरूर दीजिए। दो साल ठीक से पाल लेंगे तो आने वाली पीढिम्यों को यह खुद पालेगी।

मरने के बाद घर की चौखट और दरवाजे के लिए लकड़ी दे जाएगी। यह मरघट तक आपका साथ निभाएगी। चन्द्र भूषण तिवारी को अब दुनिया भर में जाना जाता है। मॉर्डन जेल, नारी बंदी निकेतन, पार्को और स्कूलों आदि में वह हाल में 950 पौधे लगा चुके हैं।

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