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मान और हानि

आरुषि हत्याकांड का सच क्या है, इसका पता तो शायद बरसों बाद अदालत का फैसला आने पर ही चलेगा, लेकिन इतना तय है कि नोएडा पुलिस का जांच का तरीका आदिम ही नहीं बर्बर भी है। पुलिस की कहानी और केस से जुड़े लोगों के बयानों के बाद यह समझना कठिन है कि 14 बरस की बालिका और 45 वर्षीय घरलू सहायक हेमराज की हत्या का उद्देश्य क्या था? इस हाई प्रोफाइल हत्याकांड के परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की कड़ियां भी जुड़ती नहीं दिखती हैं। अभी तक एक भी गवाह नहीं मिला है और न ही गुमशुदा सबूत (हत्या में प्रयुक्त हथियार, आरुषि व हेमराज का मोबाइल) तलाशे जा सके हैं। इतने सार छेदों के बावजूद राज्य पुलिस ने मृतक छात्रा के डॉक्टर पिता को गिरफ्तार कर लिया। किशोरी आरुषि के अधेड़ घरलू सहायक से अवैध संबंध और डॉक्टर पिता की एक पारिवारिक महिला मित्र (डॉक्टर) से नाजायज रिश्ते की कहानी उछालकर पुलिस ने एक सम्मानित महिला ही नहीं मृतक आरुषि का भी चरित्र हनन किया है। क्या पुलिस से यह अपेक्षा नहीं की जानी चाहिए कि बिना ठोस सबूत के किसी को गिरफ्तार न कर और चरित्र हनन तो कदापि न कर। आरुषि के चरित्र हनन का विरोध तो अनेक महिला संगठनों ने किया है। जो व्यक्ित अपना बचाव करने के लिए जिंदा ही नहीं है, उस पर कीचड़ उछालना नितांत अनैतिक है। अब राज्य पुलिस के खिलाफ चरित्र हनन का मामला तो दर्ज होना ही चाहिए। हत्या वाले दिन उसने घरलू सहायक हेमराज को अपराधी मान लिया और अब पिता को अभियुक्त घोषित कर दिया है। निठारी कांड में भी नोएडा पुलिस कुछ ऐसी ही कारगुजारी कर चुकी है। जब तक कानून-व्यवस्था और अपराधों की जांच का दायित्व पुलिस में अलग-अलग विभागों को नहीं दिया जाता, तब तक उसका ढर्रा सुधरना कठिन है। उत्तर प्रदेश पुलिस का हाल तो कुछ ज्यादा ही बुरा है। वहां न तो कायदे का प्रशिक्षण दिया जाता, न पुलिस को पर्याप्त संसाधन मुहैया कराए जाते और न ही आधुनिकीकरण के लिए केन्द्र से मिलने वाले धन का उपयोग होता। ऐसे में आरुषि के असली हत्यारों को खोजना रगिस्तान में सुई ढूंढ़ने के समान है।ड्ढr

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