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तौबा ऐसे वायदों से

राजस्थान की राजनीति से उठा गूजर आरक्षण आंदोलन का गुबार अब दिल्ली के दरवाजों पर दस्तक दे रहा है। राजस्थान के गूजर नेता अगर यह कह रहे हैं कि उनके साथ वादाखिलाफी हुई है तो एक तरह से यह सही भी है। चुनाव में गूजर जाति से वोट इसी वायदे से लिए गए थे कि उन्हें अनुसूचित जनजाति की श्रेणी में शामिल किया जाएगा। लेकिन न तो यह वादा पूरा किया गया और न ही इसे पूरा करना आसान भी था। और ऐसा भी नहीं है कि वादा करते समय खुद वसुंधरा राजे और भारतीय जनता पार्टी इसकी मुशकिलों को समझते नहीं होंगे। लेकि न चुनाव की बिसात पर इतनी आगे की बात सोचने की परंपरा नहीं है। मामला यहां वसुंधरा राजे या भारतीय जनता पार्टी की नीति-रणनीति पर सवाल खड़े करने का नहीं है, क्योंकि दूसरे दल भी यही किया करते हैं। मामला चुनावी राजनीति लक्ष्मण रेखा का है। एक बार जब हमने आरक्षण की व्यवस्था स्वीकार कर ली तो इसे कानून-कायदों का हिस्सा बन जाना चाहिए। फिर किसे आरक्षण के किस वर्ग में शामिल करना है, किसे नहीं करना या किसे इससे बाहर कर देना है यह सब कानून-कायदों के प्रावधान के हिसाब से ही होना चाहिए। अगर हम इसे स्वीकार कर लेते हैं तो यह तर्क निर्थक है कि आरक्षण इसलिए मिलना चाहिए कि इसके वादे ने फलां पार्टी के चुनाव घोषणापत्र की शोभा बढ़ाई थी या फलां पार्टी की चुनाव सभाओं में इसका इस्तेमाल कारतूस की तरह हुआ था। चुनावी वायदे व्यवस्था के कानून-कायदों से बड़े नहीं हो सकते। इसीलिए राजनैतिक दलों को भी व्यवस्था को चुनौती देने वाले वायदों से बाज आना चाहिए। अगर व्यवस्था में कोई बात आपको अखरती है तो आप उसमें सुधार या वैकल्पिक व्यवस्था की बात तो कर सकते हैं, पर उसमें सेंध लगाना किसी भी तरह से जायज नहीं। और बात सिर्फ आरक्षण की नहीं है। ऐसे वायदों की फेहरिस्त बहुत लंबी है जो या तो व्यवस्था में सेंध लगाने की बात करते हैं या फिर नियम कायदों को ताक पर रख देते हैं। यह फेहरिस्त बिजली के बिल और कर्ज माफ करने से लेकर किसी व्यक्ित विशेष को फांसी देने तक जाती है। लोकतंत्र में हम यह उम्मीद करते हैं कि राजनैतिक दल अपनी नीतियों, वैकल्पिक सोच या विचारधारा के आधार पर चुनाव जीतेंगे। लेकिन वे चुनाव की अपनी रेस मतदाताओं के आगे गाजर लटका कर जीतना चाहते हैं।

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