अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

असभ्य भाषा का जवाब-डू नॉट वोट देम

बुद्धि को घर की चौखट पर छोड़, चुनावी दंगल में सारी मर्यादा लांघ जानेवाले नेताओं के शब्दवाण से जनता आहत है। 16 अप्रैल को देश में पहले चरण का मतदान होगा और पहले से ही नेताओं की करनी से त्रस्त आम जनता उनकी बोलियों से भी शर्मिंदा हो रही है। कोई कहता है- क्या भगवान ने इनके सोचने-समझने की शक्ित छीन ली है या फिर मां-पिता ने इन्हें संस्कारों का पाठ नहीं पढ़ाया। पिछले दिनों चुनावी सभाओं में जल्लाद, पूतना, हाथ काट देंगे, रोलर चलवा देंगे, रिफ्यूजी, सुबह का सूरा नहीं देखने देने की धमकियों की आवाजें जनता ने सुनीं, तो उसे काठ मार गया। वह कह रही है, जब वे एक दूसर के प्रति ही ऐसी अनर्गल बातें कर रहे हैं, फिर हम इनपर कैसे विश्वास कर सकते हैं।रविवार को हिन्दुस्तान के फोन-इन कार्यक्रम वोटर बोले में फोन कर जनता ने अपना गुस्सा इन नेताओं के प्रति बखूबी निकाला। कुछ वोटरों ने तो यहां तक कहा कि ये तो पहले ही केस से लदे हुए हैं। इनसे सभ्यता की अपेक्षा करना ही बेमानी है। जनप्रतिनिधियों की अनर्गल बयानबाजी परीसदी मतदाताओं का स्पष्ट मानना था कि ऐसे नेताओं को वोट देना वोट की बरबादी है। ये पांच साल तक छाती पर मूंग दलेंगे। अपने बयानों से देश की मिट्टी पलीद करंगे। इन वोटरों का कहना था कि इसी किस्म के नेता संसद में मारपीट करते हैं, अपराधियों के साथ वक्त बिताते हैं, देश की छवि खराब करते हैं। इनका यह भी कहना था कि बिना नख-दंत के चुनाव आयोग की कमजोर कार्यशैली का लाभ इस किस्म के नेता उठा रहे हैं। वोटर मानते हैं कि ये बैलेट नहीं, बुलेट पर विश्वास रखते हैं। कम पढ़े-लिखे लोगों के राजनीति में आने के कारण भी भाषा का संस्कार खत्म हो रहा है।तीन फीसदी वोटरों ने कहा कि चुनावी दंगल में कभी-कभी भावावेश में नेता ऐसी बातें कह देते हैं। बाद में उन्हें इसका पश्चाताप होता है। वे दिल के बुर नहीं हैं, बल्कि तनाव और भावावेश में उनके मुंह से ऐसा निकल जाता है।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title: असभ्य भाषा का जवाब-डू नॉट वोट देम