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सच्ची भक्ित

सड़क पर पड़ा घायल आदमी खून से लथपथ अपना रुमाल बार-बार ऊंचा करता है- किसी को दिखाई नहीं पड़ता! गाड़ियां फर्राटे से निकलती जाती हैं- कौन झमेल में पड़े। सब के सब जल्दी में हैं। अपने लिए तक फुर्सत नहीं मिलती। फैंस पर अटकी गर्दन के साथ लटका हुआ आदमी सीमाओं के पार चला गया- फिर भी पुलिस के कार्यक्षेत्र की सीमा न तय हो पाई। दौड़ती सड़क पर टक्कर खाकर गिरा एक आदमी। एक डॉक्टर रुका। कइयों से विनती की पर कोई उसे अस्पताल तक पहुंचाने को राजी न हुआ। महंगी गाड़ी है। गाड़ी की सीटें खराब नहीं हो जाएंगी? धाराधार खून बह जाने से वह आदमी मर गया। इंसान की भावशून्यता की हद है। मदद के लिए पुकारते इन आहतों की जगह हम भी हो सकते हैं किसी दिन। हमारा बच्चा इस हालत में हो तो क्या हम कन्नी काट कर निकल सकेंगे। पर यह सब भी कौन सोचता है? किसके पास फुर्सत है यह सोचने की भी? इस उदासीनता के पीछे क्या है? प्रशासन का अभयनदान हो तो बचाने वाले शायद आगे आएं। अस्पताल पहुंचाने वाला यदि दुर्घटना के लिए जिम्मेवार हो तो भी उसको सजा देना यादा जरूरी है या घायल की जान बचाना। आए दिन पानी खोजने के लिए खोदे गए गड्ढों में मासूम बच्चे गिर जाते हें। सेना इंजीनियर, लोगों का जमघट उसे निकालने में लग जाता है। गलती बार-बार हो तो अपराध बन जाती है। इन हादसों के मूल में गड्ढा खुला छोड़ने वालों तक कोई चैनल वाले नहीं पहुंचते? रात-दिन बचाव कार्य कवरेज होती है। बच्चे के लिए आंसुओं की झड़ी लग जाती है। हादसे फिर भी दोहराए जाते हैं। समय पर जरूरतमंद की मदद न की जाए तो दान-पुण्य, पूजा, जप-तप तीर्थयात्रा सब अर्थहीन हो जाती हैं। मनुष्य भगवान का माध्यम है। उसी के हाथों वह जीवों की सहायता करता है। हम उसका साधन बन जाएं तो भक्ित पूर्णता को पहुंचती है वरना ईश्वर हमसे कोसों दूर हो जाता है।

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