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80 की दिहाड़ी चाहिए तो आठ हचाार जुगाड़ो

याद कीािए, दो साल पहले नरगा की घोषणा हुई तो राज्य भर के गरीब-गुरबों की आंखों में आशा की चमक लौटी थी। लगा था, अब शायद राज्य से पलायन रूक जाएगा। पेट की खातिर झारखंड की बहु-बेटियां को इज्जत दांव पर लगा कर परदेश का रूख नहीं करना पड़ेगा। बंधुआ मजदूरी, बाल मजदूरी रूकेगी। नरगा से साल के सौ दिन तो पेट भर ही जाएगा। जागरूकता बढ़ी तो पलामू सहित कई जगह नरगा में रोगार की मांग पर आंदोलन तक हुए। लेकिन, सरकारी बाबू कहते हैं, कोई काम मांगनेवाला नहीं!ड्ढr यह कोई विडंबना नहीं, सफेद झूठ है। यह कहना है राज्य के एक आला अधिकारी का। नरगा कार्यक्रम के प्रारूप और प्रणाली से अवगत वह अधिकारी बताते हैं कि इस कार्यक्रम को भ्रष्टाचारियों से बचाने का भरसक प्रयास किया गया है। इसके तहत कार्डधारियों का बैंक एकाउंट अथवा पोस्टऑफिस में खाता खुलवाने की जिम्मेदारी स्थानीय जिला प्रशासन पर है। मस्टर रोल के आधार पर लाभुकों के विवरण और राशि का सेंट्रल कंप्यूटर नेटवर्क में नियमित डिािटाक्षेशन होने से भ्रष्टाचार पर अंकुश लगता है। कुछ जगहों पर यह व्यवस्था सफल भी हुई। लेकिन, पलामू सहित कई जिलों में बिचौलियों-घूसखोरों ने उसका भी काट निकाल लिया। अब, काम मांगने गए बेरोगारों को कहा जाता है, गांव में कोई कुआं तालाब कुदवाओ तभी तो काम मिलेगा! जरूरतमंद सामने भी आने लगे। लेकिन, बाबुओ-बिचौलियों की मांग के सामने उलटे पांव लौट जाते। एक कुआं सैंक्शन कराने के लिये आठ से दस हाार घूस मांगते हैं ये लोग। अब बेचारा, अस्सी रूपए दिहाड़ी का मोहताज वह गरीब आठ हाार का जुगाड़ कहां से कर।

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