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महंगा विकास

लगातार कोशिशों और आश्वासनों के बावजूद महंगाई थमने का नाम नहीं ले रही है। मुद्रास्फीति का ताजा आंकड़ा 8.1 प्रतिशत को छू गया है, जो पिछले 45 माह के उच्चतम स्तर पर है। विश्व बाजार में कच्चे तेल की आसमान छूती कीमतों के मद्देनजर केंद्र सरकार द्वारा पेट्रो-उत्पादों के दाम में वृद्धि का फैसला लेना भी अधिक दूर नहीं लगता, जिससे मुद्रास्फीति और बढ़ने की ही संभावना है। इस बीच सरकार के नए आकलन के मुताबिक चालू वर्ष में राष्ट्रीय विकास दर प्रतिशत रहने की उम्मीद थोड़ी राहत अवश्य देती है, लेकिन आम जनता के लिए महंगाई सर्वाधिक चिंता का विषय है, क्योंकि यह सीधे उनकी दैनिकजिंदगी से जुड़ी हुई है। विकास दर का असली फायदा तो तभी मिलता है, जब पहले कमरतोड़ महंगाई से निजात मिले। दूसरी बात, कृषि क्षेत्र में विकास दर 2.6 प्रतिशत के पूर्व-आकलन के मुकाबले बढ़कर 3.5 प्रतिशत होने से लगातार तीसरे साल समग्र विकास दर प्रतिशत रहना इस बात का सूचक है कि मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर की धीमी पड़ी प्रगति में सुधार नहीं हुआ है। इसका विपरीत असर आगे चलकर उद्योग जगत की उत्पादकता व लाभप्रदता और रोजगार सृजन क्षेत्र पर भी पड़ना लाजिमी है। विकास दर की कमोबेश संतोषजनक रफ्तार के बावजूद सरकार की असली चिंता महंगाई बनी हुई है। पिछले कुछ महीनों के दौरान किए गए अनेक प्रयासों के भी अपेक्षित नतीजे सामने नहीं आए। सीमेंट व स्टील कंपनियों की मुश्कें कसने, कुछ जिंसों की फोरवर्ड ट्रेडिंग बंद करने, खाद्य तेल पर आयात शुल्क घटाने और बैंकों की सीआरआर में वृद्धि जसे कदम उठाते हुए कहा गया था कि इनका सार्थक असर दो महीने के भीतर नजर आने लगेगा, पर कोई विशेष फर्क नहीं पड़ा। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के ऊंचे दाम ने सरकार की मुसीबतें अलग से बढ़ा दी हैं। निकट भविष्य में कुछ रायों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं और अगले साल लोकसभा चुनाव होंगे। इसके मद्देनजर कांग्रेस नीत संप्रग सरकार पेट्रो उत्पादों के दामों में भारी वृद्धि का बोझ डालकर मतदाताओं की नाराजगी मोल नहीं लेना चाहेगी। आर्थिक फैसलों पर राजनीतिक मजबूरियां हावी होने के इस रवैये के चलते देश की तेल कंपनियों का घाटा चिंताजनक स्तर पर पहुंच चुका है। क्या यह स्थिति सरकार की आर्थिक नीतियों की दिशाहीनता की सूचक नहीं?

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