अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

क्रूरता के बम

इसे मानवता के लिए शुभ संकेत ही माना जाएगा कि दुनिया के सौ से अधिक देश नागरिक आबादी के विनाश के पर्याय समझे जाने वाले क्लस्टर बमों के निर्माण और प्रयोग पर पाबंदी लगाने पर सहमत हो गए हैं। इस संबंध में एक वर्ष तक चली मैराथन बातचीत के बाद तैयार समझौते के प्रारूप पर इस साल के अंत में मुहर लग जाने की आशा है। मजे की बात यह है कि युद्ध में टेनिस की गेंद के आकार वाले क्लस्टर बमों के इस्तेमाल पर रोक लगाने के पैरोकारों में यूरोप के ब्रिटेन सहित वे सभी देश शामिल हैं, जो नाटो समझौते के तहत अमेरिका के सैन्य सहयोगी हैं। क्लस्टर बमों का निर्माण, निर्यात और इस्तेमाल करने वाले देशों में अमेरिका सबसे ऊपर है और उसने प्रस्तावित संधि से जुड़ने से साफ इंकार कर दिया है। इसका अर्थ यही हुआ कि संधि पर हस्ताक्षर करने के बावजूद यूरोप के नाटो देश स्वयं भले ही क्लस्टर बमों का प्रयोग न करें, किंतु उनकी रक्षा के लिए अमेरिका पर प्रयोग की पाबंदी लागू नहीं होती। प्रस्तावित संधि के ऐसे छेदों को देखकर ही उसकी सफलता पर अभी से संदेह प्रकट किया जा रहा है। किन्तु तमाम खामियों के बावजूद नागरिक आबादी की सुरक्षा के लिए डबलिन में बनी सहमति महत्वपूर्ण है। विएतनाम से लेकर ईराक तक, अमेरिका ने युद्ध में क्लस्टर बमों को जमकर बरसाया है। इन बमों की वजह से शत्रु सेना के सैनिकों से कई गुना यादा निरीह नागरिक मारे गए हैं। रासायनिक हथियारों व परमाणु बम की मार भले ही गहरी हो किंतु क्लस्टर बम भी कम खतरनाक नहीं हैं। इनका असर व्यापक होता है। दुर्भाग्यवश आज मानवाधिकारों के रक्षकों के मुकाबले खतरनाक हथियारों का कारोबार करने वाले देश कहीं मजबूत हैं। युद्ध और विनाश पर अंकुश लगाने का एक समझौता तो वर्षो की मेहनत के बाद हो पाता है, लेकिन इसी बीच अनेक विनाशकारी हथियार ईजाद कर लिए जाते हैं। क्लस्टर बम बनाने वालों की सूची में भारत भी शामिल है। उसे प्रस्तावित संधि से जुड़कर अपनी नेकनीयती का परिचय देना चाहिए। इससे उसकी अंतरराष्ट्रीय छवि उजली ही होगी।ं

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title: क्रूरता के बम