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असमानता की उपज है खाद्यान्न संकट

जिस खाद्यान्न संकट के कारण करोड़ों लोगों की जिंदगी पर बन आई है, क्या वह खत्म होगा? या समय के साथ बढ़ता जाएगा? दोनों सवालों का जवाब हां हो सकता है। फिलहाल दुनिया में जिस तरह से खाद्यान्न की कीमतें बढ़ी हैं, उसका कारण तो आस्ट्रेलिया, यूक्रेन और अन्य जगहों पर पड़ा सूखा है। इसकी वजह से पैदा हुई समस्या से निपटने के लिए तुरंत ही जोरदार राहत अभियान चलाया जाना चाहिए, जिससे मौजूदा संकट निपट जाएगा। लेकिन इसके ठीक नीचे एक मूलभूत समस्या है जिसे अगर हमने नहीं पहचाना और जिसका हल नहीं निकाला तो समस्या गहराती ही जाएगी। यह दो लोगों की कहानी है। एक कहानी में ढेर सारे गरीब लोगों वाला एक ऐसा देश है जो अचानक ही तरक्की करने लग पड़ा है। लेकिन इस नई अमीरी में उसकी सिर्फ आधी आबादी ही हिस्सेदार है। ये सुविधासंपन्न लोग अपनी इस नई कमाई का बहुत बड़ा हिस्सा भोजन पर खर्च करते हैं। अगर तुरत ही आपूर्ति नहीं बढ़ती तो इसकी वजह से कीमतें बढ़ना लगभग तय है। बाकी गरीबों की आमदनी तो नहीं बढ़ी, लेकिन उन्हें खाद्यान्न की यादा कीमत चुकानी पड़ रही है इसलिए वे भुखमरी की ओर बढ़ रहे हैं। इस तरह की त्रासदी दुनिया में बार-बार लगातार हो रही है। भारत में ब्रिटिश शासन के अंतिम दौर में, 1में पड़ा अकाल इसके सबसे अच्छा उदाहरण है। तब जापान के खिलाफ चल रही लड़ाई पर हो रहे भारी खर्च के कारण अर्थव्यवस्था में तेजी थी। जिससे शहरों में और खासकर कोलकाता में रहने वाले गरीबों की आमदनी बढ़ रही थी। और इससे खाद्यन्न की कीमतें चार गुना तक बढ़ गई। लेकिन दूरदराज के गांवों में रहने वाले इतने महंगे खाद्यान्न को खरीदने की स्थिति में नहीं थे, क्योंकि उनकी आमदनी यादा नहीं बढ़ी थी। सरकार की खराब नीतियों ने स्थिति को और बिगाड़ दिया। युद्ध का समय था और ब्रिटिश शासक नहीं चाहते थे कि शहरों में किसी तरह की परेशानी खड़ी हो। उन्होंने गांवों से भारी पैमाने पर खाद्यन्न खरीदा और भारी सबसिडी के साथ शहरों में बेचना शुरू कर दिया। इससे गांवों में हालात और बिगड़ गए। गांवों में कम आमदनी वाली भूखों मरने लगे। अकाल और उसके बाद के दौर में बीस से तीस लाख लोग मारे गए। समस्या यह नहीं है कि उत्पादन कम हो रहा है। समस्या यह है कि मांग बढ़ रही है। यह बहस विश्व अर्थव्यवस्था के गरीब और अमीर की बहस में बदल गई है। हालांकि दुनिया के गरीब भी दो तरह के हैं। वे जिन्हें तेज तरक्की का फायदा मिल रहा है और वे जिन्हें इसका फायदा नहीं मिल रहा है। चीन, भारत और वियतनाम जसे देशों की अर्थव्यवस्थाओं के विस्तार से खाद्यन्न की मांग तेजी से बढ़ रही है। निश्चित रूप से अपने आप में यह एक अच्छी बात है। अगर विकास करने वाले देश अपने भीतर विकास के असंतुलन को ठीक कर लें तो अभी जिन तक इसका फायदा नहीं पहुंचा वे भी यादा अच्छा खाने की स्थिति में होंगे। लेकिन यह विकास विश्व खाद्यान्न बाजार पर भी दबाव बना रहा है। इस बढ़ती मांग के लिए कभी आपको खाद्यन्न का आयात करना पड़ता है और कभी घरेलू बाजार में कीमतों को नीचा रखने के लिए निर्यात पर पाबंदी लगानी पड़ती है। हाल के दिनों में भारत, चीन, वियतनाम और अर्जेटीना को यही करना पड़ा है। और इसकी करारी चोट गरीबों पर पड़ी है, खासतौर पर अफ्रीका के गरीबों पर। दो तरह के लोगों की इस कहानी का एक हाईटेक पहलू भी है। मकई और सोया जसी कृषि उपज का इस्तेमाल मोटर कार का ईंधन बनाने के लिए भी किया जाने लगा है। इसलिए अब भूखे पेट का कंपीटीशन ईंधन के टैंक से भी होने लगा है। सरकारों की खराब नीतियों ने भी इस आग में घी डाला है। 2005 में अमेरिकी कांग्रेस ने ईंधन के लिए एथेनॉल के इस्तेमाल का कानून बना दिया था। इस कानून के साथ ही न सिर्फ मकई की खेती के लिए सबसिडी भी दी जानी लगी वरन कई संसाधानों का इस्तेमाल खाद्यान्न के बजाय ईंधन के लिए होने लगा। भूखे पेट इस कंपीटीशन में पिछड़ने लग गए। एथेनॉल का इस्तेमाल न तो ग्लोबल वार्मिग को रोक सका और न ही पर्यावरण प्रदूषण को कम कर सका। अब अमेरिकी राजनीति अगर इसकी इजाजत दे तो हालात को सुधारने के लिए कई नीतियों में संशोधन करना होगा। एथेनॉल के इस्तेमाल के लिए कानून बनाने और सबसिडी देने के बजाय इसके इस्तेमाल में कटौती करनी होगी। विश्व खाद्यान्न समस्या इसलिए नहीं बढ़ रही कि दुनिया में इसकी उपज में कोई कमी आई है। खाद्य पदार्थों की प्रति व्यक्ित पैदावार जस की तस है। हालांकि इसका कोई पुख्ता प्रमाण नहीं है, लेकिन यह तर्क अक्सर ही दिया जाता है। इस समस्या का कारण है मांग का लगातार बढ़ना। हालांकि मांग की वजह से जो समस्या खड़ी हुई है उसका समाधान है तेजी से उत्पादन बढ़ाना। इसके लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यादा सहयोग की जरूरत पड़ेगी। जनसंख्या में वृद्धि के कारण जो मांग बढ़ी है वह कोई बहुत यादा नहीं है। यह ग्लोबल वार्मिंग जरूर बढ़ा रही है जो पर्यावरण में बदलाव से भविष्य में कृषि के लिए दिक्कतें जरूरी खड़ी कर सकती है। अच्छी बात यह है कि जनसंख्या में वृद्धि की दर कम हो रही है और औरतों के सशक्ितकरण के जरिये इसे और कम किया जा सकता है। इस सशक्ितकरण के लिए और चीजों के अलावा लड़कियों के लिए स्कूली शिक्षा का विस्तार भी जरूरी है। इस समय सबसे बड़ी चुनौती ऐसी असरदार नीतियों को खोजने की है जो विश्व अर्थव्यवस्था के तेजी से हुए विस्तार से पैदा असंतुलन से निपट सकें। जिन देशों का विकास काफी धीमी गति से हो रहा है, वहां घरेलू आर्थिक सुधार शुरू करने की बहुत यादा जरूरत है। लेकिन इसी के साथ बड़े पैमाने पर विश्व स्तर के सहयोग और तालमेल की भी जरूरत है। लेकिन सबसे पहला काम है समस्या को समझने का। लेखक नोबेल पुरस्कार प्राप्त अर्थशास्त्री हैं। फिलहाल वे लेमांट विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर होने के साथ ही हावर्ड विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र और दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर हैं।ड्ढr मिंट से साभारलेखक नोबेल पुरस्कार प्राप्त अर्थशास्त्री हैं। फिलहाल वे लेमांट विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर होने के साथ ही हावर्ड विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र और दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर हैं।ड्ढr मिंट से साभारं

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