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काशी को 62 साल बाद मिला रायबरेली, अमेठी जैसा सियासी रुतबा

नेता, अभिनेता और सियासी रणनीतिकार से देशी विदेशी मीडिया तक सब काशी के घाट पर। विश्व की सबसे प्राचीन सनातन सभ्यता की इस नगरी पर पड़ोसी पाकिस्तान से लेकर चीन और अमेरिका तक पूरी दुनिया की नजरें रुक गई हैं। गंगा की रेती पर छिड़े सियासत के इस रण का गवाह बनने को हर कोई उत्सुक है। विदेशी छात्रों के शोध का विषय बनी वाराणसी सोशल मीडिया से लेकर देशी,विदेशी अखबारों की सुर्खियों में छा गई है। साहित्य और संस्कृति की नगरी काशी का यह नया सियासी रुतबा है।

अमेठी, रायबरेली, इलाहाबाद और लखनऊ सरीखे देश की राजनीति के मजबूत गढ़ भी रसूख की इस दौड़ में काशी के मुकाबले मीलों पीछे छूट गए। 15 दिन के भीतर 12 बड़े छोटे रोड शो। 25 से अधिक फिल्मी सितारे, राजनीतिक दलों के 300 से ज्यादा राष्ट्रीय नेता और रणनीतिकार और घाटों से गलियों तक डेरा डाले देशी विदेशी मीडिया की दजर्नों टीमें शहर की इस बढ़ी सियासी हैसियत की तस्दीक कर रही हैं। हालांकि रायबरेली, अमेठी, लखनऊ, इलाहाबाद के मुकाबले वाराणसी को यह सियासी रसूख हासिल करने में 62 साल लग गए। 1952 में शुरू हुई कोशिश 2014 में परवान चढ़ी। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के राजनीति शास्त्र के विभागाध्यक्ष प्रो. कौशल मिश्र के मुताबिक1952 में ठाकुर रघुनाथ सिंह ने पं. जवाहर लाल नेहरू को पत्र लिख कर वाराणसी से चुनाव लड़ने का निमंत्रण भेजा था,लेकिन नेहरू जी ने इलाहाबाद को अपना निर्वाचन क्षेत्र चुना। यह सिलसिला लाल बहादुर शास्त्री से इंदिरा गांधी तक जारी रहा,लेकिन सफलता नहीं मिली। 1962 में रघुनाथ सिंह और 1980 में राजनारायण बनाम कमलापति त्रिपाठी की चुनावी जंग ने वाराणसी को सियासी स्तर पर जरूर मजबूत किया,लेकिन वह मुकाम नहीं मिल पाया जिसका वाराणसी के लोगों को मलाल था।

2014 के चुनाव में भाजपा से नरेंद्र मोदी के पीएम उम्मीदवार बनने और वाराणसी से चुनाव लड़ने के ऐलान से शहर की सियासी महत्वाकांक्षा फिर से जाग गई। अरविंद केजरीवाल के मुकाबले में उतरने से शहर की राजनीति का पारा उम्मीदों से भी ऊपर पहुंच गया है। प्रो. मिश्र के मुताबिक इस चुनावी मोर्चे से शहर की संस्कृति और सभ्यता दुनिया भर में पहुंच रही है। पाकिस्तान और चीन समेत कई देशों की नजर वाराणसी में हो रहे चुनाव पर टिकी है।

मशहूर शहनाई वादक भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्ला खां के बेटे हाजी मेहताब हुसैन भी इस चुनाव को अनूठा मानते हैं। हाथ में थमे विजिटिंग कार्ड दिखाते  हुए कहते हैं नेताओं और मीडिया की ऐसी धमाचौकड़ी शहर के चुनाव में पहली बार देखी है। मशहूर गायिका गिरिजा देवी कहती हैं मैं तो ज्यादातर बाहर ही रह रही हूं लेकिन जो भी हो रहा है शहर के लिए अच्छा है। दुनिया में बनारस की पहचान मजबूत होनी चाहिए।

 

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