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इंसानियत की पटरी पर दौड़ी जिंदगी की ट्रेन

दिन जुमे का, गुरुद्वार में अरदास, मंदिर में प्रार्थना। न धर्म की बात न जाति का सवाल। मकसद सिर्फ एक-ािंदगी की फतह पर फहर इंसानियत का परचम। यही परचम लहराने ईशा शुक्रवार को बंगलुरू रवाना हुई। वहां उसके दिल के छेद का ऑपरशन होना है।ड्ढr ट्यूशन पढ़ा कर बसर करनेवाली परित्यक्ता मां के लिए संभव नहीं था उसका इलाज कराना। मां-बेटी ने दस्तक दी दैनिक हिन्दुस्तान के दरवाजे पर। हिन्दुस्तान के प्रयास और विधायक रघुवर दास की प्रेरणा पर भालूबासा श्याम भक्त मंडल की टीम बनी। हिन्दुस्तान ने इस टीम को साथ लेकर शुरू किया मिशन ईशा। खबर बनी. नन्ही ईशा की जिंदगी बचा लीजिए। लोगों के हाथ बढ़ने लगे। एक तान ऐसी छिड़ी कि हर आंख रोती हुई गीत गाने लगी। इंसानियत की किरण इस तरह चमकी कि खुद ब खुद प्राण का दीपक जल उठा। सवाल था तीन लाख रुपये की रकम का। लोहा बनानेवाले शहर के फौलादी इरादों और मोम के दिलवालों ने एक सप्ताह में इतनी बड़ी रकम का बंदोबस्त कर दिया।ड्ढr हालत यह थी कि 30 को ईशा को बंगलुरू भेजना था और 2मई को हिन्दुस्तान और भक्त मंडल के लोगों को एक लाख रुपये से ज्यादा की राशि सधन्यवाद अस्वीकार करनी पड़ी। राशि पूरी हो गयी तो मंदिर में प्रार्थना और गुरुद्वारे में अरदास हुआ। शुक्रवार शाम ईशा को लेकर भक्त मंडल के सदस्य बंगलुरु रवाना हुए। टाटा यशवंतपुर ट्रेन की बोगी में पोस्टर लगा। इंसानियत तुझे सलाम।

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