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साहित्यचर्या और प्रदूषण

वैदिक युग में तो सबके सब कवियाए रहते थे। वे आपस में किस विधि चरचा कु-चरचा करते होंगे, उसके कर्मकांड की प्रविधियों और व्यवस्थाएं रही ही हैं। अनुष्ठानप्रिय समाजों में ऐसा करना ऐलीट कल्चर का द्योतक माना जाना चाहिए। सोचिए सूर, तुलसी और मीरा किसी जगह गोष्ठी में मिलते हैं। उनके सामने विषय रखा गया है: इष्ट उपासना, मुक्ित की अवधारणा या कि ईश्वर की अवधारणा। मध्यकाल में उसी तरह हिन्दी, पंजाबी व उर्दू में कवि दरबार टाइप आयोजन हुआ करते थे, जिनमें अतीत के बड़े कवियों-शायरों कबीर, तुलसी, बिहारी, गालिब, मीर के काव्य को नए लोग पढ़ कर सुनाया करते थे। इन दिनों इसका रूप कुछ भदेस सा हो चला है। समकालीन कवि एक दूसरे की कविताएं एक दूसरे को सुनाने का अयास किया करते हैं। तो जब सूर, मीरा, तुलसी रहे होंगे और कल्पना करें कि मिलें होंगे, तो किस तरह एक दूसरे को संबोधित कर रहे होंगे? लेकिन सबसे पहले सवाल होना चाहिए कि इनमें से अध्यक्षता करने वाला कौन रहा होगा किसने उन्हेंअध्यक्ष चुना होगा? वे चाय पर इकट्ठे हुए होंगे या कि ़.़ इस युग में ही इस घोर विवाद की संभावना हो सकती है। ये ओपन सवाल हैं, विद्वान सोचें और बताएं कि क्या संभावनाएं हो सकती हैं, जब आज अध्यक्षता को लेकर इतनी मारा-मारी रहती है तो तब क्या कम रहती होगी? कलजुग तो तब भी सेट-इन कर चुका था। क्या तुलसी से कोई कहता होगा कि आपकी मानस हिट हो रही है। आपका पाठ हमारी गोष्ठी में हो जाए तो हम धन्य होंगे, आपका आशीर्वाद चाहिए सर! तुलसी जी ने ऐसा सुनकर हो सकता है कोई मानस की चौपाई कही हो। इसी तरह मीरा ने सूर से फोन पर कांटेक्ट किया गया होगा और वे भी कुछ इसी तरह से पेश आए होंगे। तब कोई ए सी हॉल तो होते नहीं थे। हर गोष्ठी-मिलन मंदिरादि में ही हो सकता होगा। आश्रमों में होता होगा या घर में। ‘मिलने’ के लिए इनका कोई चेला-चाटी ‘इंतजाम’ तो नहीं ही करता होगा! वैष्णव अहिंसक टाइप के ये सजन, अपने आप कटने को आतुर हुए जा रहे नवांकुर मुर्गे को बेदर्दी से काटते तो नहीं ही होंगे।ड्ढr पुरखों से सीखना है तो पुरखों की जीवनशैली से सीखना चाहिए। उसे रिकंस्ट्रक्ट करना चाहिए। परंपरा प्रिय अपने हिन्दी समाज में अपने महान कवियों को स्मरण करते हुए उनकी साहित्यचर्या के बारे में कभी-कभी सोचना तो चाहिए कल्पना करनी चाहिए नए साहित्यकारों को जरूर करनी चाहिए। आधुनिक काल में रीतिकाल से कहते हैं कि कोई ‘लड़ाई’ लड़ी गई। लेकिन प्रमाण तो कहते हैं कि ‘गुनीजन से लेकर प्याला सुबाला चित्रशाला’ की ‘गिलगिली’ गैल सबका हिट आइडिया बन चला। वही आज तक जारी है। पता नहीं ‘परिमलिए’ या ‘पउए’ पीडब्लूए किस तरह संबेाधित करते होंगे? कुछ अज्ञेयी भीने-भीने से शांत- शांत चुप्प कम हंसने-बोलने वाले होते होंगे Êाोर से बेालना अभद्रता होती होगी। रचना को नÊार न लग जाए, हवा न लग जाए इस भाव से बात करते होंगे या कुछ ठठाकर परनिंदा के रस में डूबकर विचारधारात्मक संघर्ष चलाते होंगे। या कुछ कामरेड कह कर सीधे सशस्त्र क्रांति के लिए दांत पीसते होंगे? खेद कि साहित्यचर्या का लिखित रिकार्ड नहीं मिलता। इन दिनों गोष्ठियों में ‘कवि के मुख से’ कराया जाता रहता है। कवि है तो एक ठो ‘मुख’ होगा ही। वह जो भी वाचन करेगा वो भी मुख से ही करेगा। किसी और जगह से करने वाला पैदा हो गया हो तो मालूम नहीं। यों होने को हिंदी में कुछ भी हो सकता है। कौन जाने? इसलिए कई संस्थाए ‘कवि के मुख’ से करती रहती हैं। कवि का मुख स्पेशल होता ही है। पायरिया-डायरिया का मारा साहित्यकार दांतों की सड़न बदबू को संप्रेषित करता हुआ वह कवि मुख भी क्या ‘मुख’ होता है? शायद इसलिए हिंदी कविता में इन दिनों कोई खुशबू नहीं है। बेहतर हो जिस दिन कवि के मुख से हो कवि दिन में पांच बार कोलगेट से दो-दो मिनट ब्रुश कर ले। अच्छी तरह कुल्ला कर ले और मुख को सुवासित करने वाले, बदबू को दूर रखने वाले लिक्िवड का कुल्ला जरूर कर ले। गोष्ठी में कवि खांसते-खांसते अपने मुख से सुनाता जाता है नीचे बैेठे श्रोता ख्ांखारते रहते हैं छींकते रहते हैं। नाक सुड॥कते रहते हैं।यही तो कविता का डाइरेक्ट असर है जिस पर आलोचना में चर्चा नहीं होती। ऐसी हिन्दी आलोचना को धिक्कार है!

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