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चार हजार रुपए, में विस चुनाव जीता:भीष्म

पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की कैबिनेट में संसदीय कार्यमंत्री और सात राज्यों के राज्यपाल रहे वयोवृद्ध नेता भीष्म नारायण सिंह ने धन और बाहुबल के बढ़ते प्रभाव पर चिंता जताते हुए कहा कि मैंने अपना पहला चुनाव चार हजार में जीता था। उन्होंने भारी भरकम चुनावी खर्च को राजनीति के पतन का मुख्य कारण बताया। केंद्र सरकार में विभिन्न विभागों के मंत्री रहे गांधीवादी कांग्रेसी नेता ने बातचीत में कहा था कि 70 के दशक तक देश की राजनीति गांधीवादी दर्शन से प्रभावित थी। सभी पार्टियों में पार्टी एवं विचारधारा के प्रति निष्ठा सादगी और ईमानदारी को महत्व दिया जाता था और चुनाव में टिकट भी इन्हीं गुणों के आधार पर मिलते थे। डा सिंह ने कहा गांधीजी, लालबहादुर शास्त्री, राजेंद्र बाबू और जयप्रकाश नारायण जैसे नेता हमारे आदर्श और प्रेरणा स्रोत थे। अतीत के पन्ने पलटते हुए डा सिंह ने बताया कि कृष्णबाबू के दबाव डालने पर 1में उन्होंने तत्कालीन बिहार के पलामू विधानसभा क्षेत्र से पहला चुनाव लड़ा था। मात्र तीन जीप और चार हजार रुपए में उन्होंने यह चुनाव जीत लिया था। उनके परिवार की ईमानदारी और समाजसेवा के कारण कोई भी कार्यकर्ता प्रचार के लिए पैसा लेने को तैयार नहीं हुआ था। प्रथम राष्ट्रपति डा राजेंद्र प्रसाद के साथ राष्ट्रपति भवन में अपनी मुलाकात को याद करते हुए डा सिंह ने कहा कि राजेंद्र बाबू अपने हाथ के कते सूत के ही कपड़े पहनते थे लेकिन व्यस्तताओं के कारण उन्हें सूत कातने का समय नहीं मिल पाता था लिहाजा वह फटी चादर पर ही सोते थे। राष्ट्रपति भवन कार्यालय के लोगों ने उनके जरिए डा राजेंद्र बाबू को कहलाया कि कम से कम खादी आश्रम से चादर तो खरीदने की अनुमति मांग लें। चादर खरीदने की अनुमति पर राजेंद्र बाबू का जवाब था यह मत भूलो कि देश में करोड़ों लोग ऐसे हैं जिन्हें फटी चादर भी नसीब नही है। मैं उनका भी राष्ट्रपति हूं।ड्ढr दो बार राष्ट्रपति रहने के बाद डा राजेंद्र बाबू पटना गए तो उनके पास कुल 2500 रूपए जमा रकम थी। पंजाब नेशनल बैंक ने आज भी उसे सुरक्षित रखा है।ड्ढr उस समय देश की राजनीति पर इस तरह की शख्सियत का प्रभाव था। उस समय राजनीति सिद्धान्त एवं मूल्यों पर आधारित थी। सार्वजनिक जीवन में रहने वाला व्यक्ित आपराधिक छवि वाले व्यक्ितयों से मिलने या उनके साथ उठने बैठने के बारे में सोच भी नहीं सकता था। लेकिन वैश्वीकरण के बाद से समूचा परिदृश्य बदल गया और चुनाव एवं राजनीति पर भी इसका असर पडा। धनबल और बाहुबल का बोलबाला बढने लगा। चुनावी खर्च बढ़ने के साथ ही राजनीति में अपराधियों का प्रवेश शुरू हो गया। करीब पांच दशकों तक सक्रिय राजनीति में रहे डा सिंह ने आगाह किया कि अब वक्त आ गया है जब सभी पार्टियों को इन बुराइयों को जड़ से उखाड़ने के लिए गंभीरता से सोचना चाहिए। इसके लिए राज्य पैसा दे या सभी पार्टियां अपने प्रत्याशियों के लिए चुनावी खर्च की अधिकतम सीमा तय कर दे। उन्होंने कहा कि ये बुराइयां लोकतंत्र की जडें़ कमजोर कर रही हैं। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में जनता ही सर्वोपरि होती है। समय समय पर बड़े से बड़े नेताओं को भी मतदाता धूल चटा चुका है। इसलिए आपराधिक छवि और पैसे के बल पर चुनाव जीतने का सूबा रखने वाले प्रत्याशियों को नकार कर मतदाता राजनीति का शुद्धीकरण कर सकता है। छोटे और क्षेत्रीय दलों के उभार और इससे स्थिर सरकार के लिए उत्पन्न खतरों पर उन्होंने स्वीकार किया कि राष्ट्रीय पार्टियों द्वारा क्षेत्रीय आकांक्षाओं को को पूरा करने में विफल रहने के कारण ये दल अस्तित्व में आए और इनका प्रभाव बढ़ा। उन्होंने कहा कि क्षेत्रीय दलों से घबराने की जरूरत नहीं है। यह लोकतंत्र के विकास की प्रक्रिया का अंग है। राजनीति में मंन्थन का दौर चल रहा है। भविष्य में राष्ट्रीय दलों की स्थिति फिर मजबूत हो सकती है। क्षेत्रीय दलों में राष्ट्रीय सोच के अभाव और संकीर्णता पर डा सिंह ने बहुजन समाज पार्टी का उदाहरण देकर कहा कि पहले इसका नारा था तिलक तराजू और तलवार इनको मारे जूते चार लेकिन अब उसे समझ में आ गया है कि सबको साथ लिए बगैर काम नही चल सकता है इसलिए अब उसका नारा हो गया है। हाथी नहीं गणेश है ब्रह्मा विष्णु महेश है। इसी तरह बिहार में सामाजिक परिवर्तन की बात होते-होते अब विकास प्रमख मुद्दा बन गया है। इसके लिए उन्होंने वहां के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की प्रशंसा भी की।ड्ढr ड्ढr

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