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बेतिया में वनराज का अस्तित्व खतर में

सूबे की इकलौती व्याघ्र परियोजना वाल्मीकि टाइगर प्रोजेक्ट से लगातार बाघों की लगातार घट रही संख्या से साफ हो गया है जंगल का राजा अपने मांद में ही सुरक्षित नहीं है। बाघों की सुरक्षा तथा उनकी संख्या में वृद्धि के लिए 840 वर्ग किलोमीटर में फैली इस परियोजना पर सरकार हर साल 2.50 करोड़ खर्च करती है। इस साल जनवरी में बाघों की संख्या पर शोध करने भारतीय वन्य जीव संस्थान देहरादून से आये वन्य जीवन विशेषज्ञ जगदीश सिंह, डा. करोबी डेका दम्पति एवं जिम्मी बोरा की टीम ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि इस परियोजना में मात्र दस बाघ ही बचे हैं। दूसरी ओर वन विभाग का दावा है कि यहां कुल तैंतीस बाघ हैं। परियोजना में अंतर्राष्ट्रीय तस्करों की सक्रियता इनके शिकार की कोशिशों से स्पष्ट है।ड्ढr ड्ढr इसका एक उदाहरण गत दस मई को मदनपुर वन क्षेत्र के नौरंगिया वन परिसर में आयरन ट्रैप में फंस कर बाघ की मौत है। इससे पहले 2006 में गोवर्धना के सोनवर्षा गांव में एसएसबी द्वारा मादा बाघ की खाल एवं हड्डियां बरामद होने से भी इस गोरखधंधे का अंदाजा लगाया जा सकता है। व्याघ्र परियोजना के प्रोजेक्ट डायरक्टर भारत ज्योति बाघों की घटती संख्या के बार में बताते हैं कि वन्य जीव संस्थान देहरादून की रिपोर्ट उन्हें अबतक नहीं मिली है। हालांकि श्री ज्योति भी यह मानते हैं कि बाघों के शिकार में अंतर्राष्ट्रीय शिकारी शामिल हैं।ड्ढr ड्ढr सूत्रों का मानना है कि इस तस्करी में नेपाल के धंधेबाज शामिल हैं क्योंकि बाघ के चमड़े तथा अंगों की मांग विदेशों में भी है और वहां से इसकी सप्लाई आसान है। जब परियोजना की घोषणा हुई तो उस समय बाघों की संख्या 54 थी। वर्ष 03-04 में हुई गणना के अनुसार परियोजना में बाघों की संख्या 52 थी। जिसमें नर 17, मादा 32 तथा 3 बच्चे थे। वर्ष 04-05 में प्रकृति के प्रकोप के कारण गणना नहीं हुई। वर्ष 06-07 में वैज्ञानिकों ने गणना कर बताया कि अब 33 बाघ ही बचे हैं। परंतु 2008 के जनवरी माह में मात्र दस बाघ होने तथा एक नर की गत दस मई को हुई मौत ने परियोजना से गायब होते बाघों का रहस्य गहरा दिया है।

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  • Web Title: बेतिया में वनराज का अस्तित्व खतर में