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आ गई प्रीति..चाी मास्टर चाी

ुकरैल नाले के किनार झुग्गी-झोपड़ियों की एक बस्ती है। बीच में गंदगी से भरा बदबूदार नाला है। दोपहर के करीब सवा दो बो के आस-पास एक बच्ची हाथों में अपनी चप्पलें, कत्थई रंग का बैग और फ्राक समेटे उसी नाले में छप-छप करती चली आ रही है। किनार तक पहुँचते-पहुँचते उसके पैर कीचड़ से लथपथ हो चुके हैं। बाहर निकलकर यह बच्ची एक हैण्डपम्प से हाथ-पैर धोती है। फिर बस्ता लेकर पास में ही एक झोपड़ी में चलीोाती है। झोपड़ी में एक स्कूल चल रहा है। वह चुपचापोाकर बैठोाती है। मास्टरोी कहते हैं ‘आ गई प्रीति!’ोवाब आया ‘ाी मास्टरोी।’ इसके बाद वह बच्ची प्रीति भी बाकी बच्चों के साथ पढ़ने लगी।ड्ढr गंदे नाले को पार कर स्कूलोाने वाली प्रीति सात साल की है। उसके पिता प्रकाश मादूरी करते हैं। परिवार में माँ-पिता, दादी और दो भाई-दो बहन का प्रीति का परिवार नाले के किनार अकबर नगर की झुग्गी में रहता है। पिता की आय इतनी नहीं है कि वह प्रीति को किसी स्कूल में दाखिला दिला पाए। अन्य बच्चों की तरह उसे कूड़ा बीनना अच्छा नहीं लगता।ोबसे उसने होश संभाला तबसे उसकी पढ़ने की इच्छा थी। बीते वर्ष विज्ञान फाउण्डेशन के शहरी गरीब संघर्ष मोर्चा ने इसी बस्ती में एक स्कूल खोला। नाले के इस पार रहने वाले बच्चे तो पढ़ते थे। पर, उस पार वाले बच्चे स्कूल नहींोा पाते थे। कुकरैल पुल इतनी दूर है कि बच्चे पैदल चलकर स्कूल नहीं पहुँच सकते। पर अन्य बच्चों की तरह प्रीति ने हार नहीं मानी। वह घर से बाहर निकली और बिना किसी को बताए नाला मँझाते हुए उस पार स्कूल में पहुँच गई। स्कूल में शिक्षकों ने प्रीति का हौसला बढ़ाया और उसे कॉपी-किताबें दीं। इसके बाद तो प्रीति रो स्कूल आती है। वर्णमाला और एबीसीडी सीखने के बाद छोटे-छोटे अंग्रेाी के शब्द भी पढ़ लेती है। हिंदी-अंग्रेाी की कई कविताएँ भी उसने याद की हैं।ड्ढr पढ़-लिखकर क्या करोगी? प्रीति काोवाब था ‘डाक्टर बनूँगी’ ‘क्यों?’ ‘क्योंकि माँोब बीमार होती है तो डाक्टर साहब खूब सार पैसे माँगते हैं। हम लोगों के पास इतने पैसे नहीं होते।ोब डाक्टर बनोाऊँगी तो माँ का इलाा मुफ्त करूँगी।’ फाउण्डेशन के राघवेंद्र बताते हैं कि इस बच्ची ने कई बच्चियों को नई राह दिखाई है।

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