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अधिसंख्य कल्याण हॉस्टलों की दशा जर्जर, मुश्किलों के बीच रह रहे छात्र

भले ही अनुसूचित जाति के कल्याण के नाम पर तमाम राजनीतिक उठापटक हो ता रहे,लेकिन इस समुदाय के लिए सुविधाओं के नाम पर आज भी ठोस रूप में कुछ नहीं है। यही हालत अनुसूचित जाति के छात्रों के लिए बने कल्याण छात्रावासों की है जिसकी सुधि लेने वाला कोई नहीं। कागज पर गिनाने के लिए तो जिले में 8 कल्याण छात्रावास हैं पर छह के भवन इस कदर क्षतिग्रस्त हैं कि वस्तुत: ये आज भवनहीन हैं और इनमें एक भी छात्र नहीं रहता है। ओबरा प्रखंड में एक कल्याण छात्रावास का भवना बना तो पर आज तक वह विभाग को हैंडओवर नहीं किया जा सका इसलिए उसका भी इस्तेमाल नहीं हो रहा है और उसमें आज एक भी छात्र नहीं रहता।ड्ढr ड्ढr भवनहीन कल्याण छात्रावासों में रफीगंज, गोह, कुटुम्बा, देव, दाऊदनगर तथा नीवनगर प्रखंड मुख्यालयों में बने छात्रावास शामिल हैं। पूर जिले में एक मात्र कल्याण छात्रावास ऐसा है जिसमें छात्र रहते हैं वह है सिन्हा कॉलेज परिसर में बना कल्याण छात्रावास। 45 छात्रों की क्षमता वाले इस छात्रावास में फिलहाल लगभग 100 छात्र भेड़-बकरियों की तरह रह रहे हैं। कई दशक पुराना यह छात्रावास आज तक बिजली कनेक्शन से नहीं जुड़ा। किसी भी कमर में एक पंखा तक नहीं है। यहां बने छह शौचालयों में मात्र दो ही कारगर हैं तथा प्रतिदिन सुबह यहां कतारं लगती हैं। पानी के लिए यहां सिर्फ एक चापाकल है। दो अन्य चापाकल खराब पड़े हैं। पानी की टंकी बिठाई जानी थी।ड्ढr ड्ढr शौच के लिए जाना पड़ता है नदी के किनारड्ढr गिरिाानंदन शर्मा समस्तीपुरड्ढr जिले के अनुसूचित जाति छात्रावासों के हालात दलित छात्रों के कल्याण की दिशा में उठाए गए तमाम प्रयासों की भंडाफोड़ कर रहे हैं। पेयजल की समस्या, भवन की जर्जर स्थिति, शौचालय की टंकी से निकलकर छात्रावासों में फैलता मल, भवनों पर उगे पेड़ पौधे, चहारदिवारी के नाम पर टूटी ईंटों के अवशेष, हेडलेस चापाकल, चारों ओर गंदगी और बदबू मिले तो समझ लीजिए कि आप जिले के अनुसूचित जाति छात्रावास पहुंच चुके हैं। शहर के काशीपुर स्थित अनुसूचित जाति के छात्रावास में फिलवक्त 150 छात्र हैं। 14-14 कमरों की दो बिल्डिंगें हैं, जिनमें एक 10 से निर्माणाधीन है। हालांकि छात्र उसमें भी भेड़ बकरियों की तरह रह रहे हैं। दूसरा भवन भी काफी पुराना है। एक कमर में चार की जगह पांच से छह छात्र रह रहे हैं। दोनों भवनों में चार-चार शौचालय थे जो खराब पड़े हैं। शौचालय का मल हॉस्टल के मेस में भरा हुआ है। जहां सिर्फ पिल्लू ही नजर आते हैं। छात्र सुबह शाम शौच के लिए खुले में एक किलोमीटर दूर बूढ़ी गंडक नदी के किनार जाते हैं। स्वच्छता अभियान वालों की नजर इधर नहीं पड़ी है। परिसर के तीन चापाकलों में एक ही चालू है। छात्रों को स्नान करने के लिए घंटों लाइन लगानी पड़ती है। बरसात आते ही छात्र अपना बोरिया बिस्तर समेट लेते हैं। हॉस्टल के कमर तथा फील्ड लगभग एक ही समतल में हैं। नतीजतन वर्षा का पानी फील्ड में जमा होने के साथ-साथ कमर में भी घुस जाता है। जल निकासी की कोई सुविधा नहीं है। पटोरी तथा दलसिंहसराय अनुमंडल में बने छात्रावास में रह रहे छात्र शौचालय के लिए आसपास के खेतों में जाते हैं। दलसिंहसराय के विद्यापतिनगर के मऊ बाजितपुर मध्य विद्यालय परिसर में बने दो मंजिला छात्रावास के वर्षो बीत गए पर अबतक उसका उद्घाटन ही नहीं हुआ। इस छात्रावास में स्कूल चल रहा है। दूसरा छात्रावास दलसिंहसराय अनुमंडल मुख्यालय में है जहां शौचालय पूरी तरह ध्वस्त है।ड्ढr ड्ढr गोपालगंज में 40 की जगह 200 छात्र रह रहेड्ढr नीरा पाठकब्रजेश मिश्र गोपालगंजड्ढr जिले के दलित छात्रावासों में भेड़ बकरियों की तरह रहने को मजबूर हैं छात्र। शहर के अंबेदकर छात्रवास की क्षमता 40 छात्रों की है लेकिन इसमें 2 सौ छात्र रह रहे है। 7 शौचालयों में दो भस गए हैं। पीएचईडी की जलापूर्ति नहीं है। तीन चापाकलों से काम चलता है। पंखे व बल्ब जल गए हैं। एक हाल में रहने वाले छात्र जसे किसी शरणार्थी शिविर में रहते हैं ऐसा लगता है। बेड के पास ही खाना बनाते हैं। इसके अलावा 25-25 सीटों वाले नेचुआ जलापुर तथा थावे के दलित छात्रावासों की भी यही हालत है। बरसात में छतें रिसती हैं। भवन जर्जर हैं। नौकरी कर रहे कुछ दबंग सीनीयर छात्र भी कमरों में जबरन कब्जा जमाकर रहते हैं। छात्रों ने कहा कि लाइब्रेरी, कम्प्यूटर व परिसर में सोलर लाइट की जरूरत है। अंबेदकर की प्रतिमा परिसर में लगी है जिसपर शेड नहीं होने से मूर्ति खराब हो रही है। रात्रि प्रहरी तथा टेलीफोन की सुविधा भी नहीं है। रसोइया बराबर गायब रहता है। छात्र अपने से खाना बनाकर खाते है। वहीं दलित वर्ग की छात्राओं के लिए हॉस्टल की व्यवस्था नहीं रहने से महिलाओं में उच्च शिक्षा के प्रति अवासीय सुविधा के अभाव में रुचि नहीं है।ं

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