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सोना उगलते खेतों की खाद

उत्तर बिहार के अनेक युवा किसानों ने इस बार अपने खेतों में सोना उपजाया। उनके गेहूं की बालियां पहले से बड़ी थी। अमूमन एक बाली में 42 से 52 दाने रहते हैं, इस बार 72 से 82 दाने थे। दाने भी काफी पुष्ट। एक एकड़ खेत में 26 क्िवंटल 40 किलोग्राम तक गेहूं की उपज हुई। मकई तथा अन्य फसलों में भी इसी प्रकार की उपज वृद्धि हुई। इन किसानों ने रासायनिक उर्वरकों और जहरीले कीटनाशकों का प्रयोग बंद कर, जविक कृषि की शुरुआत की है। केंचुआ खाद (वर्मी कम्पोस्ट) नीम की पत्तियों ओर गोमूत्र के संयोग से बने कीटनाशाक के प्रयोग का ही कमाल है कि दो वर्षो के अंदर ही उनके खेतों की उर्वराशक्ति वापस लौट आयी। जब रासायनिक खादों का प्रयोग शुरू हुआ था तो उपज बढ़ी थी। लेकिन धीरे-धीरे उर्वराशिक्त क्षीण होती गई और खेती का खर्च बढ़ता चला गया। जविक कृषि के द्वारा कम सिंचाई में ही अच्छी फसल होने लगी है क्योंकि अब मिट्टी में वर्षा जल को सोखकर टिकाये रखने की क्षमता काफी बढ़ गई है। जिन खेतों में जविक खादों के सहारे सब्जी उगाई जा रही है, वहां की सब्जियां यादा स्वादिष्ट और यादा पौष्टिक हैं। मुजफ्फरपुर में लीची के जिन बागानों में जविक खाद और जविक कीटनाशक का प्रयोग हो रहा है वहां की लीची का रंग, आकार और स्वाद बेहतर है। यही कारण है कि जविक खेती के द्वारा उपजाये गये अनाज, फल और सब्जियों के भाव भी यादा मिलते हैं। रासायनिक कृषि से फसल चक्र भी बिगड़ गया है। एक ही प्रकार की फसल बार-बार लगाने से मिट्टी की उर्वराशक्ति नष्ट हो जाती है। दाल और अनाज वाली फसलों को अदल-बदल कर बोने या मिश्रित रूप से बोने पर खेत उर्वर बने रहते हैं। जविक कृषि करने वालों ने इसे फिर से अपनाया है। रासायनिक कृषि से पौधों के लिए आवश्यक सूक्ष्म पोषक तत्व भी समाप्त होने लगे हैं। मिट्टी की जांच का झंझट सामने आता है और सूक्ष्म पोषक तत्वों को महंगे दाम पर खरीद कर खेतों में छिड़कने पड़ते हैं। जबकि केंचुआ खाद में सभी पोषक तत्व पर्याप्त मात्रा में होते है। एसिनिया फटिडा केंचुआ द्वारा निर्मित जविक खाद में नाइट्रोजन, फॉस्फेट और पोटैशियम के साथ-साथ पर्याप्त मात्रा में कैल्शियम, मैग्निशियम, कोबाल्ट, मोलिब्डेनम, बोरोन, सल्फर, लोहा, तांबा, जस्ता, मैंगनीज, जिबरैलीन, साइटोकाइनीन तथा ऑक्सीजन पाया जाता है। इसके अलावा इसमें बहुत सारे बायो ऐक्िटव कम्पाउंड, विटामिन और एमिनोएसिड होते हैं। यहां के किसानों की नई पीढ़ी मधुमक्खी पालन का काम भी अपनाने लगी है। बिहार के सवा लाख से यादा किसान परिवार मधुमक्खी पालन और शहद उत्पादन से खुशहाल हुए हैं। जिन फसलों के आसपास मधुमक्खी के बक्से रखे जाते हैं। वहां उपज में बीस प्रतिशत की वृद्धि हो जाती है, क्योकि मधुमक्िखयां फसलों के परागन में मददगार होती हैं। लेकिन जहरीले रासायनिक कीटनाशकों के छिड़काव के कारण काफी मधुमक्िखयां मर जाती है। उनके साथ तितली, केंचुए आदि खेती के मित्र जीव-जन्तु भी मर जाते हैं। नुकसान देह कीटों को खा जाने वाले मेढ़कों के जीवन पर भी आफत है। कौए, गौरेये, कोयल तथा अन्य चिड़ियों की चहचहाहट तथा कबूतरों की ‘गुटूर गूं’ भी कम सुनाई पड़ती है चील भी कम दिखाई देते है, और गिद्ध तो दिखाई ही नहीं देते। लेकिन जिन गांवों में जविक कृषि होने लगी है, वहां मित्र जीव जन्तुओं की सुरसुराहट, चिड़ियों की चहचहाहट और हलचल का मधुर संगीत फिर से सुनाई देने लगा है। मध्यकाल से ही सरइसा परगना (अब का तिरहुत) के एक बड़े इलाके में किसान, नगदी फसल के रूप में तम्बाकू की खेती करते आ रहे हैं। किसान जानते हैं कि वे तम्बाकू के रूप में जहर उपजा रहे हैं। लेकिन पेट की खातिर इसे करना पड़ता है। पर तम्बाकू की खेती अब फायदे में नहीं रही। ऐसे में अनेक किसानों ने पुदीना, लेमन ग्रास, अश्गंधा, सफेद भूसली, शतावर, आंवला, हरर्ेे, बहेड़ा, जस्टीसिया जसे सैंकड़ों औषधीय पौधों की खेती शुरू की है और उन्हें अच्छा मुनाफा भी मिलने लगा है। देशी और अंतरराष्ट्रीय बाजार में इनकी बड़ी मांग है। आठ साल पूर्व कम्मन छपड़ा गांव के फुदेनी पंडित, गोविन्दपुर के श्रीकांत कुशवाहा और मनिकपुर के सुबोध ने जब केंचुआ खाद और जविक कीटनाशक तथा औषधीय पौधों का प्रचार प्रसार शुरू किया था तो लोग इन्हें पागल समझता था। उनके घर वाले भी रासायनिक कृषि को छोड़ जविक कृषि अपनाने के लिए तैयार नहीं थे। आज ये किसानों के प्ररेणा स्रोत और मार्गदर्शक बन गये हैं। दरभंगा, मधुबनी, समस्तीपुर, मुंगेर, भागलपुर हर जगह जविक कृषि का प्रसार होने लगा है। इससे खेती की लागत भी घट रही है और रोजगार के नए अवसर भी पैदा होने लगे है। जविक कृषक मंडलों का गठन होने लगा है और जविक कृषक पंचायत बुलाकर जविक कृषि अपनाने का फै सला भी लिया जा रहा है। वीरेन्द्र नरेश जसे कई लोग उत्साह से इस काम में लगे हैं। हाल ही में सकरी-सरैया गांव में आयोजित एक कृषक पंचायत में फुदेनी पंडित और श्रीकांत कुशवाहा को सम्मानित किया गया।ड्ढr कुछ वर्ष पूर्व असम से जर्मनी तथा अन्य यूरोपीय देशों को निर्यात की गई चाय वापस लौटा दी गई थी। उस चाय में जहरीले कीटनाशकों तथा रासायनिक फर्टिलाइजर के अंश पाये गये थे, जिन्हें मानव स्वास्थ के लिए हानिकारक माना जाता है। नासिक से निर्यात किये गये अंगूर को भी इसी कारण लौटाया गया था। अमीर देश अपने यहां आयात की जानेवाली सब्जियों, फलों, अनाज तथा दूध आदि की जांच के बाद निरपद पाये जोन पर ही लेते हैं। इसलिए चाय बागान वाले अब केचुआ खाद और जविक कीटनाशकों का प्रयोग करने लगे हैं। इनकी मांग काफी बढ़ गई है और उत्पादकों को अच्छी आमदनी भी हो रही है। निर्यात किये जाने वाले फलों, सब्जियों आदि के उत्पादन के लिए भी इनकी मांग बढ़ी है। सरकार कुछ सब्सिडी भी देने लगी है। लेकिन सब्सिडी का यादा पैसा या तो बिचौलिये मार लेते हैं या वापस लौट जाता है। एसएन चक्रवर्ती, कृष्णमोहन सिन्हा और अब्दुल रब ताहा जसे स्टेट बैंक अधिकारी जो जविक कृषि को बढ़ावा देने हेतु गांव-गांव जा रहे हैं, लेकिन यादातर बैंक कर्मी उदासीन या नकारात्मक रवैया ही रखते हैं। सरकार भी सिर्फ निर्यात वाले खाद्य पदार्थो के जविक उत्पादन की चिंता करती है। खेती में जहरीले रसायनों के प्रयोग से पंजाब में कैंसर तथा अन्य घातक बीमारियों का प्रसार हुआ है। क्या हम रासायनिक उर्वरकों तथा जहरीले कीटनाशकों के लिए दी जानी भारी सब्सिडी का समाप्त करके उस पैसे को जविक कृषि में लगे कृषकों की मदद में खर्च नहीं कर सकते?ड्ढr लेखक सामाजिक कार्यकर्ता हैं

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