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की करां! टाइम ही नहीं मिलदा

इसे उत्तर भारत में रहनेवालों का दुर्भाग्य कहा जाएगा कि उन्हें आज तक ऐसा नेता नहीं मिल सका, जो उन्हीं के इलाके में रोजगार पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध करा सके ताकि मानव को अपने घर-बार परिवार को छोड़ने की नौबत ही न आए। यद्यपि वोट मांगने वाला हर नेता और सरकार यही वादा पिछले 60 बरस से करते आ रहे हैं। और जनता उम्मीद भी रखती है। लेकिन अभी तक निराशा ही मिलती रही है। उनकी यह निराशा कब खत्म होगी यह वे खुद भी नहीं जानते हैं।ड्ढr विजय कुमार सिंह ‘भूपेन्द्र’, नई दिल्ली हिन्दी पढ़ने पर अवरोध क्यों?ड्ढr दिल्ली विश्वविद्यालय से एम.ए. हिन्दी करने के इच्छुक बी. ए. (हिन्दी आनर्स) के छात्रों को भी नियमित कॉलेजों में प्रवेश लेने हेतु न्यूनतम 55 प्रतिशत अंकों की बाध्यता पिछले कई वर्षो से जारी है। इससे कम अंक वाले छात्रों को प्रवेश परीक्षा देनी पड़ रही है। जिसके कारण हजारों छात्र-छात्राएं चाहकर भी एम. ए. हिन्दी में प्रवेश से वंचित किए जा रहे हैं। स्कूल ऑफ ओपन लर्निग में भी यही नियम चल रहे हैं। एक तरफ लोग अंग्रेजी की ओर भाग रहे हैं, वहीं अपनी मातृभाषा राष्ट्रभाषा हिन्दी में उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले छात्रों के सामने न्यूनतम अंकों और प्रवेश परीक्षा की बाधा खड़ी की जा रही है।ड्ढr दयानंद वत्स, बरवाला, दिल्ली पिछड़ने की लालसाड्ढr आजादी के साठ साल बाद हमारी यह हालत है कि पिछड़ेपन में शामिल होने की होड़ लगी है, अनेक जातियां व अनेक कौमें निरंतर मांग करती जा रही हैं कि हमें पिछड़े वर्ग में शामिल करो। कोई यह नहीं कहता कि हम पिछड़े रहना नहीं चाहते। क्या इसे हम देश की प्रगति कहेंगे?ड्ढr चिन्मय व्यास, माल देवता, देहरादूनं

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